॥ दादूराम-सत्यराम ॥
*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"*
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज
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*= परिचय का अंग - ४ =*
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*साधु समाना राम में, राम रह्या भरपूर ।*
*दादू दोनों एक रस, क्यों कर कीजै दूर ॥१८४॥*
टीका - हे जिज्ञासुओं ! भक्त तो परमेश्वर में समा रहे हैं और परमेश्वर भक्तों में व्यापक है । इस प्रकार सेवक - सेव्यभाव विलीन होकर भक्तजन भगवतरूप होते हैं, फिर द्वैतभाव नहीं प्रतीत होता है ॥१८४॥
कीन्हे कोटिक जतन सब, अब गहि काढै कौन ।
मो मन मोहन रूप मिलि, ज्यों पानी में लौंन ॥
पानी ही तैं हिम भया, हिम ह्वै गया बिलाय ।
जे कुछ था सो ही भया, अब कछु कह्या न जाय ॥
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*सत्संग महात्म*
*दादू सेवक सांई का भया, तब सेवक का सब कोइ ।*
*सेवक सांई को मिल्या, तब सांई सरीखा होइ ॥१८५॥*
टीका - हे जिज्ञासुओं ! जब सेवक सांई में अभेद हो गया, तब स्वामी का सम्पूर्ण मायावी ऐश्वर्य, सेवक की सेवा करता है, क्योंकि जब सेवक सांई में मिल गया, तो फिर सांई का स्वरूप ही हो गया । जो कुछ सांई का था, वह सब सेवक का हो जाता है ॥१८५॥
"ज्ञानी जैसा राम है, तैसा साधू होइ ।
इनकी संगति बैसतां, मुक्ति परम पद जोइ ॥"
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*मिश्री मांही मेल कर, मोल बिकाना बंस ।*
*यों दादू महँगा भया, पारब्रह्म मिल हंस ॥१८६॥*
टीका - हे जिज्ञासुओं ! जैसे मिश्री में मिलकर बांस भी मिश्री के भाव में बिक जाता है । इसी प्रकार मुक्तजन भी परब्रह्म में मिलकर परब्रह्म रूप हो जाते हैं ॥१८६॥
"पीपा" पारस परसतां, लोहा कंचन होइ ।
सिद्ध की संगति बैसतां, साधक भी सिद्ध जोइ ॥
जल "जगन्नाथ" कुठौर का, सुरसरी मिलि पिबंत ।
जाइ कालिमा लौह की, पारस परस तुरंत ॥
(क्रमशः)

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