॥ दादूराम-सत्यराम ॥
*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"*
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज
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*= परिचय का अंग - ४ =*
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*राम बिना किस काम का, नहीं कौड़ी का जीव ।*
*सांई सरीखा ह्वै गया, दादू परसै पीव ॥१९०॥*
टीका - हे जिज्ञासुओं ! परमात्मा के विचार बिना इस अज्ञानी जीवात्मा का मनुष्य जीवन व्यर्थ ही जाता है । किन्तु सतगुरु कृपा से यदि जीवात्मा पीव को "परसै" कहिए, स्वस्वरूप को पहिचाने, तो सांई सरीखा निरावरण होकर ब्रह्मस्वरूप हो जाता है ॥१९०॥
राम विमुख नर होहिंगे, सर्प गोहिरा न्योबी ।
और जन्तु की को गिने, सो हरि बोलो हरि बोल ॥
कुण्डलिया -
टक्का साटै टोकरी, गेरत फिर्यो गँवार ।
कियो नहीं उपकार कछु, भज्यो न सिरजनहार ॥
भज्यो न सिरजनहार, भार ढोयो निसि भोरा ।
खायो खेल्यो खूब, जरा नहीं जान्यो ढोरा ॥
बैठ सन्त की संगति गयो नहीं काशी मक्का ।
हार्यो जनम हराम, हाथ में रह्यो न टक्का ॥
दोहा -
कोडी को केहर नहीं, पीपा पायो ज्ञान ।
नरसी होकर अवतर्यो, परसे श्री भगवान ॥
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*पारिख अपारिख*
*हीरा कौड़ी ना लहै, मूरख हाथ गँवार ।*
*पाया पारिख जौहरी, दादू मोल अपार ॥१९१॥*
टीका - हे जिज्ञासुओं ! मूर्ख के हाथ में हीरा एक कौड़ी भी मूल्य नहीं पाता और वही हीरा परीक्षा करने वाले जौहरी के हाथ आ जावे तो अपार मोल का होता है । इसी रीति से हीरारूप मनु ष्य - जन्म और राम - नाम की महिमा को संसारीजन नहीं समझ पाते, किन्तु सतगुरु रूप जौहरी मिल जावे तो जिज्ञासु अपार परब्रह्म के स्वरूप में अभेद होकर स्वयं भी परब्रह्मरूप हो जाता है ॥१९१॥
"कबीर" जब गुण का गाहक मिले, तब गुण लाख बिकाइ ।
जब गुण का गाहक नहीं, तब कौड़ी बदले जाइ ॥
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*अंधे हीरा परखिया, कीया कौड़ी मोबी ।*
*दादू साधू जौहरी, हीरे मोल न तोबी ॥१९२॥*
टीका - हे जिज्ञासुओं ! अंधे पुरुष के हाथ में हीरा दें और उसे पूछें कि इसकी कीमत क्या है ? वह बोलता है, चिकना सा पत्थर है, एक कौड़ी का होगा । और वही हीरा जौहरी के हाथ में जाने से जौहरी बोलता है - यह हीरा अमूल्य है । ऐसे ही मनुष्य देहरूपी हीरे की सांसारिकजनों से कीमत पूछें, तो वे "कौड़ी" कहिए संसार के विषय - वासना रूप भोगों को भोगने की ही कीमत बतलातें हैं, क्योंकि वे इतना ही जानते हैं । जौहरीरूप सतगुरु के पास जावें, तो वह मनुष्य देह की अपार कीमत बतलाते हैं, अर्थात् मनुष्य देह के द्वारा अपार परमात्मा की प्राप्ति होती है ॥१९२॥
ज्ञानी जैसा राम है, तैसा साधू होइ ।
इनकी संगति बेसतां, मुक्ति परम पद जोइ ॥
(क्रमशः)

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