सोमवार, 3 दिसंबर 2012

= परिचय का अंग =(४/१८१-८३)

॥ दादूराम-सत्यराम ॥
*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"* 
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज 
*= परिचय का अंग - ४ =* 
*जहाँ राम तहाँ संतजन, जहाँ साधु तहाँ राम ।*
*दादू दोन्यूं एकठे, अरस परस विश्राम ॥१८१॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! जहाँ राम है, वहीं तो संतजन हैं और जहाँ संतजन है, वहीं राम है । भक्तों की अन्तःसुरति परमात्मा में ही लीन रहती है । इसलिये भगवान् और भक्त एकरस होकर एक स्थान ब्रह्म सुरति में ही परमानन्द का अनुभव करते हैं ॥१८१॥ 
श्रीमद् भागवत श्लोक - 
साधवो हृदयं मह्यं, साधुनां हृदयन्त्वहम् । 
मदन्यं ते न जानन्ति, नाहं तेभ्यो मनागपि ॥ 
सन्तो दिशन्ति चक्षूंषि बहिरर्कः समुत्थितः । 
देवताः बान्धवाः सन्तः सन्त आत्माऽहमेव च ॥ 
भगवान क हते हैं कि साधु लोग मेरा हृदय और मैं साधु लोगों का हृदय स्वरूप हूँ, वे मुझ से दूसरे को नहीं जानते और मैं भी अन्य को नहीं जानता हूँ । सन्त तो सूर्य की तरह ज्ञानरूपी चक्षु देने वाले हैं । अतः सन्त ही देवता व बान्धव हैं । सन्त तो मेरी आत्मा हैं, वे मेरा ही स्वरूप हैं ।
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*दादू हरि साधु यों पाइये, अविगति के आराध ।*
*साधु संगति हरि मिलै, हरि संगति तैं साध ॥१८२॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! "हरि" कहिए भगवान् और "संत" कहिए साधु, इस प्रकार प्राप्त होते हैं कि भगवान् की भक्ति करने से भगवान् संतों को मिलते हैं और संतों की भक्ति करने से संत भगवान् को मिलते हैं ॥१८२॥ 
"न रोधयति मां योगो न सांख्यं धर्म एव च । 
न स्वाध्यायस्तपस्त्यागो नेष्टापूर्तं न दक्षिणा ॥ 
व्रतानि यज्ञश्छन्दासि तीर्थानि नियमाः यमाः । 
यथा वरुंणे सत्संगः सर्वसंगापहो हि माम् ॥"
(भागवत)
परीक्षित शुक आराध के, मुक्त भये तत्काल । 
भक्तराम जी टूक दे, भयो उदयपुर निहाल ॥ 
दृष्टान्त - राजा परीक्षित ने ऋषियों का आदेश प्राप्त करके अवधूत यतिवर शुकदेव जी की आराधना की । तत्काल महाराज आ गए । राजा ने महाराज के चरण - स्पर्श किए । सिंहासन पर पधराये और पूर्वोक्त सम्यक् ऋषि और शृंगी ऋषि के शाप का वृत्तान्त कह दिया । शुकदेव मुनि सुनकर बोले - "राजन् ! कोई चिन्ता मत करो । हम आपको सात दिन में मुक्त कर देंगे ।" फिर महाराज शुकदेव मुनि ने श्रीमद् भागवत पुराण की राजा को सप्ताह श्रवण कराई । राजा सुनकर भक्ति - ज्ञान द्वारा मुक्त हो गए ।
दूसरा दृष्टान्त - छोटी बाईजी के थोंभे के दादूपंथी दयाराम जी के शिष्य भक्तराम जी जमात उदयपुरवाटी में टींटैड़ा स्थान पर निवास करते थे । एक रोज एक वैष्णव(वैरागी) सालगराम जी की मूर्ति लेकर महाराज के पास पहुँचा और बोला - महाराज ! मैं यह भगवान् की मूर्ति आपके यहाँ रख दूं, क्योंकि मैं द्वारका यात्रा करने जा रहा हूँ, जब आऊँगा तब ले जाऊँगा । भक्तराम जी बोले - भाई ! तुम इनके अपने हाथों से बनाया शुद्ध भोग लगाते हो, हम तो रोटी बनाते नहीं हैं, झोली लाते हैं बनी बनाई । उसका भोग तो हम लगा देंगे । वैरागी बोला - हाँ महाराज ! उसका ही लगा देना । फिर वैरागी चला गया । भक्तराम जी ने विचार किया, ठाकुर जी से तो पूछा ही नहीं, कि वे झोली की रोटी खाएँगे कि नहीं । महाराज भक्तराम जी कुटिया की तरफ मुँह करके बोले - "ठाकुर जी महाराज !" अन्दर से आवाज आई - "हाँ भक्तराम जी ।" संत बोले - झोली की रोटी का भोग लगा लोगे ? ठाकुर जी - हाँ, जो आप दोगे, वही पा लूंगा । दूसरे रोज झोली लाए और तूम्बी के एक पात्र में ठाकुर जी के लिए झोली की रोटी के टुकड़े - टुकड़े रख दिए, दूसरे पात्र में अपने लिए रख लिए । ठाकुर जी प्रगट हो गये । टुकड़े उठा - उठा कर खाने लगे । दोनों ने जल पी लिया । भगवान् अन्तर्धान हो गए । भक्तराम जी भजन करने लगे । यह क्रम रोजाना चलता रहा । जब वैरागी साधु तीर्थयात्रा से लौटे तो उन्होंने भक्तरामजी से पूछा - मेरे ठाकुरजी भूखे तो नहीं रहे ? भक्तरामजी बोले - तुम्हारे ठाकुरजी तो हमारे साथ ही बैठकर भिक्षान्न का भोग लगाते हैं, भूखे कैसे रहते ! आप भी ठाकुरजी के साथ प्रसाद पाओ । वैरागी - हम तो स्वपाची हैं, अपने हाथ का बना हुआ ही भोजन लेते हैं । भक्तरामजी ने थाल में भोजन परोसत कहा - "भगवान् ! पधारो, प्रसाद पाओ ।" एक थाल पर भक्तरामजी और दूसरे थाल पर ठाकुरजी भोजन करने विराजे । देखते ही देखते दोनों थालों का भोजन समाप्त । परन्तु वैरागी साधुजी को भगवान् दिखाई नहीं दिए, अतः वे बोले - हम कैसे मान लें कि ठाकुरजी ने आपके साथ में प्रसाद पाया है, हमें तो उनके दर्शन ही नहीं हुए । भक्तरामजी ने भगवान् से प्रार्थना करते हुए कहा - "प्रभो ! इन्हें दर्शन देने की कृपा करें, क्योंकि इन्होंने ही तो मुझे आपके दर्शनों का शुभ अवसर प्रदान कर मेरे जीवन को कृतार्थ किया है ।" उसी समय मूर्ति में से भगवान् विष्णु प्रकट हुए और वैष्णव साधुजी को दर्शन देकर कृतकृत्य कर दिया । तभी कहा है - "साधु संगति हरि मिलै, हरि संगति तैं साध ।"
*दादू राम नाम सौं मिलि रहै, मन के छाड़ि विकार ।*
*तो दिल ही मांहैं देखिये, दोनों का दीदार ॥१८३॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! मन के विषय विकार को त्यागकर राम नाम में ही अभेद होइये और अपने हृदय स्थान में ही भगवान् और भक्त का दर्शन करिये व आत्मा परमात्मा की एकता का अनुभव करिये अर्थात् भगवान् और भक्त की एकता में क्या परमानन्दभाव उपजता है ? यह वर्णन नहीं हो सकता है । आप स्वयं अनन्य भक्त होकर ही अनुभव करो ॥१८३॥
(क्रमशः)

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