मंगलवार, 11 दिसंबर 2012

= परिचय का अंग =(४/२२१/३)

॥दादूराम सत्यराम॥
*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"* 
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी 
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज 
*= परिचय का अंग - ४ =* 
*सूक्ष्म सौंज अर्चा बन्दगी*
*दादू नूरी दिल अरवाह का, तहाँ बसै माबूदं ।*
*तहँ बंदे की बंदगी, जहाँ रहै मौजूदं ॥२२१॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! "अरवाह" कहिए जीवात्मा के नूरी = पवित्र दिल में "माबूदं" परमात्मा बसता है । अगर ऐसे पवित्र हृदय में भक्तजन परमात्मा का स्मरण करें, तो परमेश्वर का प्रत्यक्ष होता है ॥२२१॥ 
वाल्मीक वन में हते, मानुष कई हजार । 
उलट नाम दियो सप्त रिषि, जपत नूर भये पार ॥ 
दृष्टान्त - वाल्मीकि जाति से भील थे । लूटना खसोटना, हिंसा आदि कर्म किया करते थे । एक रोज उस रास्ते से कोई मुसाफिर नहीं आया । यह उदास होकर बैठे थे । विचार किया कि आज खाने - पीने का काम कैसे चलेगा ? शाम का समय होने को आया कि उस रास्ते से इसको सात पुरुष आते दिखलाई पड़े । "मारूँगा ।" "क्यों ? हमने क्या अपराध किया ?" वाल्मीकि बिना अपराध ही मारता हूँ और उनका सब कुछ छीन लेता हूँ । उससे अपने कुटुम्ब का पालन करता हूँ । सप्तर्षि बोले - ऐसे ही ले लो, मारो मत । वाल्मीकि - ऐसे - किसी ब्राह्मण को दान करो । मैं तो खून निकाल कर लेता हूँ । ऋषि बोले - "कुछ दया कर, हम लोग तपस्वी हैं ।" संतों का दर्शन और उनके वचन सुनकर अन्तःकरण में इसके कुछ अच्छी भावना जाग्रत हुई । इसका सम्पूर्ण पाप जिंदगी भर का, इसको याद आने लगा और बोला - "मुझ पापी पर दया करो, जिससे मेरा उद्धार होवे । मुझे उपदेश देओ ।" सप्तऋषि ने अधिकारी जानकर, "राम" नाम का उपदेश कर दिया और बोले - "इसका जाप करना, इससे तेरा उद्धार हो जायेगा ।" वह राम नाम में स्थित होकर राम का नाम जपने का प्रयास किया, किन्तु मुख से राम का शब्द नहीं निकला, पाप आड़े आ गये - "पापी के मुख से राम नहीं निकले", तब राम का नाम उल्टा "मरा - मरा" निकला । उसके सूधे भाव से "मरा - मरा" नाम भी सूधा होकर "राम - राम" बन गया ।
"दादू" मुख की ना गहै, हिरदै की हरि लेहि । 
अन्तर सूधा एक सौं तो बोल्यां दोस न देहि ॥ 
चौपाई - 
उल्टा नाम जपा जग जाना, 
वाल्मीकि भये ब्रह्म समाना ॥ 
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*दादू नूरी दिल अरवाह का, तहँ खालिक भरपूरं ।*
*आली नूर अल्लाह का, खिदमतगार हजूरं ॥२२२॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! जीवात्मा के पवित्र हृदय में ही परमेश्वर ज्योति स्वरूप में स्थित है । इसलिए परमेश्वर के दर्शनों के लिए "खिदमतगार" कहिए, भक्ति करने वाले भक्तजन प्रति क्षण हजूरी में रहकर स्मरण करते हैं ॥२२२॥ 
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*दादू नूरी दिल अरवाह का, तहँ देख्या करतारं ।*
*तहँ सेवक सेवा करै, अनन्त कला रवि सारं ॥२२३॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! जीवात्मा के शुद्ध हृदय में "करतार" कहिए, सृष्टि रचयिता परमेश्वर स्थित है, वहीं भक्तजन उसका दर्शन करके उसी शुद्ध हृदय में जीवात्मा, परमात्मा की स्मरणरूप बंदगी करता है ॥२२३॥ 
ज्योतिषामपि तज्ज्योतिस्तमसः परमुच्यते । 
ज्ञानं ज्ञेयं ज्ञानगम्यं हृदि सर्वस्य तिष्ठतिम् ॥
(क्रमशः)

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