॥ दादूराम-सत्यराम ॥
*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"*
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज
.
*= परिचय का अंग - ४ =*
.
*काया सूक्ष्म कर मिलै, ऐसा कोई एक ।*
*दादू आत्म ले मिलैं, ऐसे बहुत अनेक ॥२०१॥*
टीका - हे जिज्ञासुओं ! पूर्वोक्त प्रकार से स्थूल शरीर, पवनवत्, रूप रहित और सुरति रूप बनाकर परमात्मा में तदाकार होने वाले बिरले पुरुष होते हैं, कबीर जी, दादू जी जैसे । किन्तु शरीर का विसर्जन करके, सूक्ष्म देह से मिलने वाले अनेक हुए हैं और होंगे । प्रस्तुत साखी में प्रथम दो साखियों का भाव, उच्चतम प्रतिपादित किया है । तथापि इससे कोई ब्रह्मज्ञानियों की ब्रह्मरूपता में कोई विरूपता की आशंका करना योग्य नहीं है, क्योंकि ब्रह्मरूपता में न्यून अधिक भाव असम्भव है ॥२०१॥
दुर्लभ मिटबो वासना, नो तत काको नास ।
"तुलसी" केते पच गये, दे दे तन को त्रास ॥
.
*सुन्दरी सुहाग*
*आडा आत्म तन धरै, आप रहै ता मांहि ।*
*आपण खेलै आप सौं, जीवन सेती नांहि ॥२०२॥*
टीका - हे जिज्ञासुओं ! आत्मा सुन्दरी देहाध्यास को बिसार कर, "आप रहै ता मांहि" अर्थात् आप स्वयं परमेश्वर में रत रहती है । अर्थात् अपने अन्तःकरण की वृत्ति को स्वस्वरूप में ही लीन करें और अपने हृदय स्थान में आत्म - स्वरूप में ही विचरण करें, जैसे सुहागिन स्त्री व्यवहार में पड़दा रखे, किन्तु अपने पति से प्रेमभाव होवे तो व्यावहारिक पड़दा नहीं रहे । वैसे ही आत्मारूपी सुन्दरी को परमेश्वर की प्राप्तिरूप सुहागन होवे, तब तक आत्मारूपी सुन्दरी देहाध्यास या आपारूप पड़दा किये हुए है । जब तक यह जीवात्मा देहाध्यास या आपा के पड़दे को नहीं हटावे, तब तक प्रीतम से अभेदता सम्भव नहीं है, अतः एकरूपता नहीं होवे है ॥२०२॥
.
*अध्यात्म*
*दादू अनुभै थैं आनन्द भया, पाया निर्गुण नांव ।*
*निश्चल निर्मल निर्वाण पद, अगम अगोचर ठांव ॥२०३॥*
टीका - हे जिज्ञासुओं ! स्वस्वरूप में अभेद होने से परमानन्द प्रापत होता है । कैसे ? "पाया निर्गुण नांव" अर्थात् सतगुरु ने जो नाम का उपदेश किया, उस नाम ने हमारे सम्पूर्ण भय को नष्ट कर दिया है । और अब हमने निर्भय पद पाया है अर्थात् परमेश्वर का निर्भय स्वरूप पा लिया है । सो निश्चल, एक रस, निर्मल, वासनाशून्य, निर्वाण, माया आवरण से मुक्त, मन बुद्धि से अज्ञेय और इन्द्रियों से अगोचर है, जो अनुभव से जाना जाता है, ऐसा परमतत्व स्थान पा लिया है ॥२०३॥
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें