शुक्रवार, 7 दिसंबर 2012

= परिचय का अंग =(४/२०४-६)

॥ दादूराम-सत्यराम ॥
*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"* 
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी 
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज 
*= परिचय का अंग - ४ =* 
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*दादू अनुभै वाणी अगम को, ले गई संग लगाइ ।*
*अगह गहै, अकह कहै, अभेद भेद लहाइ ॥२०४॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओ ! संतों की सुरति का ब्रह्माकार हो जाना ही अनुभव वाणी है । संतजन ब्रह्माकार सुरति होकर अगह ब्रह्म को अगह ही रूप करके साक्षात्कार करते हैं और "अकह" कहिए, अकथनीय स्वरूप को अकथ ही कहकर कथन करते हैं । इस रीति से सब में अभेद ब्रह्मा का उसमें अभेद होकर ही मर्म को प्राप्त करते हैं ॥२०४॥ 
मधुरिकी मधु काढके, मधु में देत मिलाय । 
त्यों अनुभै जग जीव को, ब्रह्म माहिं ले जाय ॥ 
*जो कुछ बेद कुरान थैं, अगम अगोचर बात ।*
*सो अनुभै साचा कहै, यहु दादू अकह कहात ॥२०५॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! जो गुप्त से भी गुप्त तत्व है, वह वेद और पुराण आदि से भी शक्ति वृत्ति द्वारा "अगम अगोचर" कहिए अविषय है । वेद पुराण भी शक्ति - वृत्ति से उसका वर्णन नहीं कर सकते क्योंकि उसका यथार्थ अनुभव से ही बोध होता है । वेद, पुराणों ने भी उसको अकह रूप अर्थात् वक्तृत्व का अविषय और "नेति - नेति" कहकर बताया है ॥२०५॥ 
जाकै निश्चय उपजै, अनुभव आत्म ज्ञान । 
सुन्दर सो बोलै नहीं, सहज भया गलतान ॥ 
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*दादू जब घट अनुभै उपजै, तब किया कर्म का नाश ।*
*भय अरु भ्रम भागे सबै, पूरण ब्रह्म प्रकाश ॥२०६॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! जब ब्रह्मज्ञान उत्पन्न होता है, तब सूक्ष्म - संसार की वासना अन्तःकरण से नष्ट हो जाती है । फिर भय, भ्रम आदि से निर्भय और निर्मल स्वरूप होकर मुक्तजन अखंड पूर्ण ब्रह्मस्वरूप से प्रकाशते हैं ॥२०६॥ 
भिद्यते हृदयग्रन्थिः छिद्यन्ते सर्वसंशयाः । 
क्षोयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन् दृष्टे परावरे ॥(कठ.)
सप्त भय - 
इहलोक परलोक भय, मरण - वेदना घात । 
अणरक्षा अरु गुप्त भय, अकस्मात् भय सात ॥ 
पंचविध भ्रम - 
भेद भ्रम कर्तृव्य भ्रम, पुनि भ्रम संग विकार । 
ब्रह्म इतर जग सत्य, भ्रम पंचम भ्रम संसार ॥
(क्रमशः)

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