॥ दादूराम-सत्यराम ॥
*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"*
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज
.
*= परिचय का अंग - ४ =*
.
*दादू अनुभै काटै रोग को, अनहद उपजै आइ ।*
*सेझे का जल निर्मला, पीवै रुचि ल्यौलाइ ॥२०७॥*
टीका - हे जिज्ञासुओं ! आत्म - ज्ञान से जिज्ञासुजनों के जन्म - मरण आदि रोग नष्ट हो जाते हैं और "सोहं सोहं" ररंकार आदि शब्दों की अखंड ध्वनि उत्पन्न होती है और ब्रह्मरूप भूमि से अनहद शब्द रूपी स्त्रोत द्वारा ब्रह्मभाव अद्वैत निर्मल जल प्रगटता है । फिर अखंड ध्वनि रूप लय लगाकर प्रीति से ब्रह्मानन्द रूप अमृत रस का पान करके मुक्तजन कृत - कृत्य भाव को प्राप्त होते हैं ॥२०७॥
.
*दादू वाणी ब्रह्म की, अनुभै घट परकास ।*
*राम अकेला रहि गया, शब्द निरंजन पास ॥२०८॥*
टीका - हे जिज्ञासुओं ! अनुभव वाणी की महिमा कहते हैं कि जब ब्रह्म की प्राप्ति रूप अनुभव वाणी का हृदय में प्रकाश हुआ, तो फिर केवल ब्रह्मभाव ही व्याप्त है और मुक्तजन शब्दातीत कहिए, शब्द से परे जो ब्रह्मस्वरूप है, उसी में मग्न हो रहे हैं ॥२०९॥
.
*जे कबहूँ समझै आत्मा, तौ दृढ़ गह राखै मूल ।*
*दादू सेझा राम रस, अमृत काया कूल ॥२०९॥*
टीका - हे जिज्ञासुओं ! जो कदाचित् पूर्व - पुण्य अपना उदय हो या हरि गुरु संतों की कृपा हो जावे, तो यह जीवात्मा अपने आत्म - स्वरूप को पहचान कर अपने मन को दृढ़ता से सब का मूल कारण जो ब्रह्म है, उसमें अभेद करता है । इसके बाद ब्रह्मभूमि से जो रामरस रूपी स्त्रोत प्रकटता है, उसे साधक काया रूपी तट पर स्थित होकर आत्मानन्द भाव से अमृतरस को पीता है, ऐसे पुरुष को धन्य है ॥२०९॥
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें