॥दादूराम सत्यराम॥
*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"*
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज
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*= जरणा का अंग - ५ =*
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*जरणा करने की विधि*
*लै विचार लागा रहै, दादू जरता जाइ ।*
*कबहुँ पेट न आफरै, भावै तेता खाइ ॥७॥*
टीका - हे जिज्ञासुओं ! जैसे रुचिपूर्वक भोजन किया जाता है, वह अच्छा पच करके रस बनाता है, उसी प्रकार विचारपूर्वक परमेश्वर के नाम - स्मरण में लय लगाइये और जो आनन्द प्राप्त होवे, उसको अपने हृदय में ही जरणा करो । इस प्रकार अनन्य विरहभाव सहित राम का अनुभव करोगे, तो प्रभु के स्मरण से कभी भी तृप्ति नहीं होगी और पेट नहीं आफरेगा ॥७॥
सींग नृप के शीश में, और न जाणै कोइ ।
नाई खानि में कही, खानि में धुनि होइ ॥
दृष्टान्त - एक राजा के सिर में सींग उग आया । राजा हजामत नहीं करावे । बाल बड़े - बड़े बढ़ गए । मंत्री ने कहा - अन्नदाता, हजामत बनवाइये । नाई को बुलवाया । राजा अलग एक कमरे में बैठकर नाई से बोले - "मेरे सिर में सींग है, किसी को कहना नहीं । अगर कह देगा, तो फांसी पर लटका दूँगा ।"
नाई ने हजामत तो बना दी, परन्तु पेट अफरने लगा और घर पहुँचते - पहुँचते तो पेट ढोल की तरह ऊँचा आ गया । वापिस राजा के पास आया ।
बोला - महाराज ! मैं मरा, देखो पेट अफर रहा है । राजा बोला - क्या हो गया ? नाई - महाराज ! वही बात आप वाली । अब मैं आप वाली बात कहूँ, तब तो मेरा अफारा उतर जावे, नहीं तो पेट फटकर मर जाऊँगा ।
राजा बोला - जंगल में जहाँ कोई न हो, ऐसी जगह जा, वहाँ कह, ताकि तेरा अफरा उतर जावे । नाई दौड़ कर जंगल में पहुँचा और जहाँ से कुम्हार खोदकर मिट्टी लाते थे, उस गड्ढे में जाकर तीन आवाज लगाई, "राजा के सिर सींग ।" नाई का अफारा उतर गया और घर आ गया ।
पीछे से कुम्हार मिट्टी लेने उस खान में गया । वहाँ प्रतिध्वनि हो रही थी, "राजा के सिर सींग ।" वह अपनी फावड़ी टोकरी छोड़कर दौड़ा । लोगों ने पूछा - "क्या हो गया ?" मेरी खान में भूत है, आवाज हो रही है कि राजा के सिर सींग ।" यह बात सारी जनता में फैल गई और राजा के पास पहुँच गई ।
राजा नाराज हुआ । मैंने नाई को कहा था, एकान्त में जाकर कहना । उसने सारी दुनिया को सुना दिया ।" नाई को बुलाया । "क्यों रे मूर्ख ! तैंने सारी दुनिया को सुना दिया ?" नाई ने पूर्वोक्त सब वृत्तान्त राजा को कह दिया । राजा ने विचार किया कि जड़ पदार्थ के भी शब्द की जरणा नहीं हुई, तब मनुष्य कैसे जरणा कर सकता है ? परन्तु यहाँ पर जरणा परमेश्वर के निष्कामी सच्चे भक्त ही कर सकते हैं, संसारीजन नहीं कर सकते ।
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*जनि खोवै दादू रामधन, हिरदै राखि जनि जाइ ।*
*रतन जतन करि राखिये, चिंतामणि चित लाइ ॥८॥*
टीका - हे जिज्ञासुओं ! रामधन की जरणा करो और हृदय में गुप्त रखो, बाहर प्रकट नहीं करना और इस चिंतामणि रूप परमात्मा के नाम को अपनी वृत्ति में अन्तर्मुख धारण करो । यह अमोलक रत्न है ॥८॥
गोपनीयं प्रयत्नेन सरत्नकरण्डकम् ।
कस्यचिन्नैव वक्तव्यं कुल्स्त्रीसुरतं यथा ॥
"हीरा, हेम, लाल, मणि, मोती,
रतन पदारथ जिसो जतन ।
"जगन्नाथ" जगदीश पाय नग,
जन - जन आगे कहै न जन ॥"
रत्नमंजूषा को कुलीन स्त्री के प्रसंग की तरह गुप्त रखना चाहिये, उसी तरह रामधन(भजन) को भी प्रकट मत कीजिये ।
रत्न मुस्यो बहु मोल को, छिप्यो जा मुर्दा मांहि ।
चोट सहारी सेल की, तो भी कसक्यो नांहि ॥
दृष्टान्त - एक चोर ने सुना कि राजा के यहाँ चिंतामणि रूप हीरा है । तब चोर ने जौहरी का रूप बनाया और नकली हीरे लिये । दरबार में जाकर एक हीरा राजा के नजर किया । तब राजा ने भी अपना चिंतामणि हीरा निकाल कर जौहरी के पास रख दिया । चोर राजा की आँख बचाकर उसकी जगह दूसरा नकली हीरा रख दिया और चिंतामणि रूप हीरा उठाकर अपनी जेब में डाल लिया ।
वहाँ से चल पड़ा । पीछे से राजा का जौहरी आया, बोला - "वह तो कोई ठग था ।" राजा खुद सेना लेकर चल पड़ा खोज निकालता - निकालता । आगे एक जगह कई मुर्दे पड़े थे । चोर ने सोचा, राजा मेरे खोज निकालता आ रहा है, मैं इस मुर्दे के पास मुर्दा बन जाऊँ । खोजी के सहित राजा वहाँ आ पहुँचे और खोजी बोला - आगे खोज नहीं चलते हैं, यहीं है चोर इन मुर्दा में । राजा ने कहा - एक - एक बेंत इनके जोर से मारो । चोर होगा तो वह आप बोलेगा ।
पर कोई नहीं बोला । खोजी ने कहा - इन्हीं में है । राजा के हुक्म से एक - एक सेल जांघ में मारा, नहीं कसका । राजा ने कहा, अब क्या करें ? खोजी - वह हीरा उसी को दे दो, वह तब प्रकट होगा । राजा बोला - वह हीरा तुझे ही दे दिया, सब कसूर माफ कर दिया, प्रकट हो जा । इतना कहते ही चोर बैठा हो गया । राजा बोला - तेरे को हमने इतनी त्रास दी, तूं क्यों नहीं बोला ? तब चोर बोला -
लज्जा आती मुर्दा नूं, हत्थों जातो हीर ।
ताथैं हौं कसक्यो नहीं, सुनियो साह सुधीर ॥
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*सोइ सेवक सब जरै, जेती उपजै आइ ।*
*कहि न जनावै और को, दादू मांहि समाइ ॥९॥*
टीका - हे जिज्ञासुओं ! वही सच्चा सेवक है, जो अपने अन्तःकरण में उत्पन्न हुए आत्मज्ञान को गुप्त रखता है । और परमात्मा की प्रेमभक्ति जो हृदय में उत्पन्न हुई है, उसको किसी को कहकर न बतलावे, क्योंकि विषयी, पामर, सकामी लोग भक्ति को नहीं पचा सकते ॥९॥
"छ: प्रकार जरणा कही, श्री दयालजी भाखि ।
धन, आनन्द, प्रकाश, रस, गुण, परचा, द्रढ राखि ॥"
(क्रमशः)

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