रविवार, 6 जनवरी 2013

= जरणा का अंग =(५/१०-१२)

॥दादूराम सत्यराम॥
*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"* 
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी 
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज 
*= जरणा का अंग - ५ =*
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*सोइ सेवग सब जरै, जेता रस पीया ।*
*दादू गुझ गंभीर का, प्रकाश न कीया ॥१०॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! वही राम का सच्चा सेवक है, जिसने राम का स्मरणरूपी रस पीया है और उसको गुप्त रखता है । अर्थात् "गूझ" कहिए गुप्त, गम्भीर, सर्वोत्तम, रामधन को प्रकाश यानी कहकर प्रकट नहीं करता है ॥१०॥ 
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*सोई सेवक सब जरै, जे अलख लखावा ।*
*दादू राखै रामधन, जेता कुछ पावा ॥११॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! जो अलख परमेश्वर को प्रत्यक्ष करके गुप्त रखता है और अपने राम के स्मरण को अपने हृदय में ही सुरक्षित रखता है । ऐसे जरणा करने वाले पुरुष को धन्य है, वही सच्चा सेवक है ॥११॥ 
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*सोइ सेवक सब जरै, प्रेम रस खेला ।*
*दादू सो सुख कस कहै, जहाँ आप अकेला ॥१२॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! राम का सच्चा सेवक वही है, जिसको जितना प्रेमाभक्ति का आनन्द प्राप्त हुआ है और एकता की अनुभूति की है, उस सबको गुप्त रखता है, क्योंकि वह कैसे कहे ? "जहाँ" कहिए हृदय आकाश में आप स्वयं अधिष्ठान चैतन्य से ओत - प्रोत हो गया है । वह सुख अवाच्य है ॥१२॥ 
(क्रमशः)

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