॥दादूराम सत्यराम॥
*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"*
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज
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*= जरणा का अंग - ५ =*
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*दादू समझ समाइ रहु, बाहरि कहि न जनाइ ।*
*दादू अद्भुत देखिया, तहँ ना को आवै जाइ ॥४॥*
टीका - हे जिज्ञासुओं ! सतगुरु उपदेश को और आत्म - तत्व को विचार करके समझो और उसी में लयलीन रहो । किन्तु बहिर्मुख होकर इस अपने भेद को किसी को नहीं कहना । इस प्रकार जो जरणावान पुरुष है, उसका आना - जाना नहीं होता है और गुरु उपदेश से आत्मा का जो साक्षात्कार हुआ है, उससे कभी विमुख नहीं होता । ऐसे जरणा करनेवाले साधक का और ब्रह्म का स्वरूप आश्चर्ययुक्त है । फिर उस स्थिति को प्राप्त करने के बाद उसमें व्यावहारिक प्रपंच कोई भी नहीं रहता है, अर्थात् सत्यस्वरूप से भिन्न नहीं होता है ॥५॥
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*कहि कहि क्या दिखलाइये, सांई सब जाने ।*
*दादू प्रगट क्या कहै, कुछ समझि सयाने ॥५॥*
टीका - हे जिज्ञासुओं ! यह विश्वास रखिए कि घट - घट अन्तर्यामी प्रभु तेरे शुभ - अशुभ कार्यों को हृदय में ही स्थित होकर सब देख रहे हैं । उस प्रभु के सामने तुम अपने भक्तिभाव को क्या प्रकट करते हो ? क्योंकि इससे तुम्हारा द्वैतभाव प्रकट होगा । इसलिये अपनी उत्तम करणी, भजन भाव, आदि को सांसारिक लोगों को भी कहकर नहीं सुनाना, क्योंकि कहने से एक तो पतिव्रत खंडित होगा और द्वितीय, भजनभाव आदि का फल नष्ट हो जाएगा ॥६॥
"बाहर कहि न जनाइये, भीतर क्रिया साध ।
जगन्नाथ प्रगट किये, ह्वै अंतराइ उपाध ॥"
देख संत को तबकली, मैं क्यूं हूँ परसीध ।
लुख्यो जाइ आये प्रभु, तब खंकार्यो कीध ॥
दृष्टान्त - एक संत से किसी पुरुष ने प्रश्न किया कि आप दुनियां में प्रसिद्ध हो रहे हो और दुनियां आपको मानती है, इसका क्या कारण है ?
संत बोले - हम रामजी का भजन करते हैं और राम का विश्वास रखते हैं ।
तब वह पुरुष बोला - "मैं भी राम का विश्वास कर लूं ।"
संत बोले - "हाँ, जरूर करो ।"
"तुम्हारी तरह प्रकट हो जाऊँगा ?"
संत बोले - "जरूर हो जाओगे ।"
"कहाँ विश्वास करूँ ?"
संत बोले - जंगल में जा और हृदय में राम का विश्वास धारकर मुख से राम - नाम का उच्चारण कर ।"
तबकली बोला - "रोटी कहाँ से खाऊँगा ?"
संत - "जिसका भजन करेगा, वे आप ही लाकर देंगे ।"
संत के वचन में विश्वास कर के जंगल में जा बैठा । दो दिन तक कोई कुछ भी नहीं लाया । तीसरे दिन राम जी ने देखा कि यह तो संत - वचन में विश्वास किये बैठा है, अब तो मैं रोटी ले कर चलूं । दो रोटी और सब्जी लेकर जमींदार का रूप बनाकर उसके पास आए । बोले - "ले रोटी खा ले ।" रोटी खाई, पानी पीया और फिर ध्यान में बैठ गया । रोटी खिलाने वाला अंतर्ध्यान हो गया ।
इस प्रकार तीन रोज तक रोटियां ला - ला कर खिलाते रहे । चौथे दिन राम जी ने विचार किया - इसकी परीक्षा तो कर लें ? इसको मेरा विश्वास है भी कि नहीं ? तब बहुत देर लगा दी । वह बैठा - बैठा इधर - उधर झाँकने लगा और विचार किया, "आज रोटी लेकर नहीं आया ? क्या बात हुई ? कहीं भूल तो नहीं गया है ?"
राम जी ने देखा - इसके मन में घुड़दौड़ मच गई है । तब अचानक बहुत दूर इसको आते दिखलाई पड़े । फिर राम जी जरा टेढ़े - टेढ़े दूसरे रास्ते पर जाने लगे ।
तब यह जरा ऊँचा - ऊँचा होकर देखने लगा, घुटनों के बल खड़ा हो गया । फिर और भी टेढ़े चले राम जी । तो यह बिल्कुल खड़ा हो गया और सोचने लगा, "मुझे आज उसने देखा नहीं ।" तब तो दोनों हाथ ऊँचे उठा लिए, फिर भी राम जी उधर नहीं झाँके । तब तीन खँकारे किये । राम जी फिर भी नहीं झाँके ।
तब बोला - "मैं यहाँ हूँ । इधर आ, इधर ।" राम जी अन्तर्धान हो गए । यह सोचने लगा, "वह तो अब दिखलाई नहीं देता है ।"
तब आवाज हुई, "हे बंदे ! तैंने विश्वास त्याग दिया मेरा । क्या खँकारे करता हैं ? मैं तो घट - घट की जानता हूँ । अब जा, हल चला, कमा कर खा ।" वह मन में पश्चाताप करता हुआ अपने घर चला आया ।
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*दादू मन ही मांहैं ऊपजै, मन ही मांहि समाइ ।*
*मन ही मांहैं राखिये, बाहर कहि न जनाइ ॥६॥*
टीका - हे जिज्ञासुओं ! मन में ही आत्मज्ञान उपजता है और उसको मन में ही रखना चाहिए । मन में ही ब्रह्म में लीन होना । अपने मन में ही ब्रह्मानन्द का अनुभव करना । किसी अनधिकारी को कहकर नहीं सुनाना । अथवा जो कुछ अच्छी - बुरी मन में उत्पन्न होवे अपनी - पराई, उसको मन में ही रखना, जरणा करना ॥६॥
मोहम्मद जी और आइसा, रहे बणिक गृह हेठ ।
असुचि रूई दई कातने, नेम निभायो ठेठ ॥
दृष्टान्त - एक रोज मोहम्मद साहब व उनकी स्त्री आइसा, एक बनिये की हवेली के नीचे ठहर गए । बनिये ने दर्शन किया, ज्ञान सुना । सुबह - शाम इनके पास बैठने लगा ।
बनिये की स्त्री ईश्वर - विमुख थी । उसे यह बात अच्छी न लगी । वह उनको उठाने की चेष्टा करती रहती, परन्तु संत को सताना अच्छा नहीं होता है । उसके एक छोटा बच्चा था । बच्चे के टट्टियाँ लग गईं । बनिया के रूई का कमरा भरा था । वह रूई का चूंखा लेवे और बच्चे की टट्टी पोंछकर उनकी तरफ फेंक दे ।
आइसा ने दो चार फुए आते देखे, उनमें विष्टा लगा हुआ था । मोहम्मद जी से बोली - महाराज ! यह गन्दे फुए ऊपर से फेंकती है । मोहम्मद जी बोले, "इनको धो - धो कर सुखाओ ।" कितने ही रोज हो गए, ऐसा काम होते । रूई बहुत इकट्ठी हो गई । आइसा बोली - "महाराज, इसका क्या करोगे ?"
मोहम्मद जी बोले - "इसको कातो और कूकड़ी उतार - उतार कर इकट्ठी कर लो । सेठ जी का है, सेठ जी को दे देंगे ।" जब सेठ जी आए, सत्संग सुना । जाने लगे, तब आइसा बोली - "यह सूत ले जाओ, आपका है ।" सेठ गट्ठर उठाकर अन्दर ले गया । अपनी स्त्री को बोला - सूत कातने को कब दिया था ?
मोहम्मद जी बोले - "माता जी, आप ऊपर से रोज कितने दफा फुए फेंकती थी ? हमने सोचा कि यह माता जी देती है कातने को । यह गंदी नहीं है, इसको धोकर, सुखा कर फिर कतवाया है ।" माता जी यह सुनते ही नीचे आई और मोहम्मद साहब और आइसा के कदमों में नमस्कार किया । अपना अपराध क्षमा करवाया । मोहम्मद और आइसा ने इतनी जरणा की । उस स्त्री को परमेश्वर की प्राप्ति का उपदेश देकर शुद्ध बना दिया ।
(क्रमशः)

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