*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"*
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज
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*= परिचय का अंग - ४ =*
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*नाना विधि पिया राम रस, केती भाँति अनेक ।*
*दादू बहुत विवेक सौं, आत्म अविगत एक ॥३३९॥*
टीका - हे जिज्ञासुओं ! नाना प्रकार कहिए ज्ञान - भक्ति द्वारा भक्तजन राम - रस का पान करते हैं, परन्तु फिर भी यह इच्छा सदैव रहती है कि जैसे एक शरीर है, ऐसे अनेक शरीर होते, तो भरपूर राम - रस पान करते । अनेक प्रकार से कहिए वे संत अपने को मछलीरूप और राम को जलरूप जानकर आनन्दित रहते हैं या फिर अपने को हंस और राम के स्मरण को मोतीरूप जानकर चुगते हैं । अपने को चातक और राम के स्मरण को स्वाति नक्षत्र की बूँद जानकर राम - रस का पान करते हैं । फिर इस प्रकार वे जीवात्मा में एकरूप हो जाते हैं ॥३३९॥
कवित्त
हंस स्वरूप ह्वें मोती चुग्या हरि,
भँवर स्वरूप ह्वै कँवल लुभाया ।
मीन स्वरूप पिया रस अमृत,
ह्वै मरजीवा जु सिन्धु समाया ॥
चातक रूप रट्या निसवासर,
होय चकोर जु चित्त लगाया ।
हो "छीतर" भाँति अनेक भज्या हरि,
दादूजी पीव सूं प्रेम बढ़ाया ॥
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*परिचय महात्म*
*परिचय का पय प्रेम रस, जे कोई पीवै ।*
*मतवाला माता रहै, यों दादू जीवै ॥३४०॥*
टीका - हे जिज्ञासुओं ! "परिचय का पय" अर्थात् परमात्मा का दर्शन रूपी "पय" = दूध जो कोई भक्तजन पीते हैं, वे मतवाले मस्त होकर जीवन - मुक्ति भाव को प्राप्त होते हैं ॥३४०॥
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*परिचय का पय प्रेम रस, पीवै हित चित लाइ ।*
*मनसा वाचा कर्मणा, दादू काल न खाइ ॥३४१॥*
टीका - हे जिज्ञासुओं ! मन, वचन, कर्म से चित्त को हेत लगाकर जो भक्तजन परमात्मा का दर्शनामृत रूपी दूध को पीते हैं, वे काल, कर्म से मुक्त हो जाते हैं ॥३४१॥
हरि रस तैं हरि सारिखे, अमर भये कई कोटि ।
जगन्नाथ चाखत मिटै, जुरा मरण की खोटि ॥
(क्रमशः)

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