*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"*
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज
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*= परिचय का अंग - ४ =*
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*परिचय पीवै राम रस, युग युग सुस्थिर होइ ।*
*दादू अविचल आतमा, काल न लागै कोइ ॥३४२॥*
टीका - हे जिज्ञासुओं ! परमात्मा का दर्शनामृत रूप दूध को जो भक्तजन पान करते हैं, वे ही युग - युग में स्थिर भाव को प्राप्त होते हैं । उन जीवात्माओं को कोई भी काल("काम काल, क्रोध काल, लोभ काल भाई....") स्पर्श नहीं कर पाता ॥३४२॥
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*परिचय पीवै राम रस, सो अविनाशी अंग ।*
*काल मीच लागै नहीं, दादू सांई संग ॥३४३॥*
टीका - हे जिज्ञासुओं ! ब्रह्म - परिचय रूप अमृत पीने वाला संत अविनाशी परमात्मा का स्वरूप है । वह मृत्युरूप काल से रहित होकर परमात्मा के साथ अभेद होता है ॥३४३॥
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*परिचय पीवै राम रस, सुख में रहै समाइ ।*
*मनसा वाचा कर्मणा, दादू काल न खाइ ॥३४४॥*
टीका - हे जिज्ञासुओं ! परमात्मा का परिचय रस पीजिए । इसी प्रकार उस आनन्द स्वरूप में समाइये । मन, वचन, कर्म से पालन करके काल से रहित होओगे ॥३४४॥
(क्रमशः)

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