॥दादूराम सत्यराम॥
*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"*
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज
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*= परिचय का अंग - ४ =*
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*परिचय पीवै राम रस, राता सिरजनहार ।*
*दादू कुछ व्यापै नहीं, ते छूटे संसार ॥३४५॥*
टीका - हे जिज्ञासुओं ! परमेश्वर का परिचयरूपी राम - रस का पान कीजिए तो फिर काम, क्रोध आदि दोष नहीं व्याप्त होंगे और संसार में जन्म - मरण से मुक्त हो जाओगे ॥३४५॥
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*अमृत भोजन राम रस, काहे न विलसै खाइ ।*
*काल विचारा क्या करै, रम रम राम समाइ ॥३४६॥*
टीका - हे जिज्ञासुओं ! मानव जीवन में स्वस्वरूपी राम - रस का अनुभव करना, यही अमृत भोजन है । विलसे, खाइ, उपभोग करे, अंगीकरण करे, पचावे, इस तरह जो साधक परिचय प्राप्त कर लेता है, उसको फिर कोई काल - कृतान्त रूप काम, क्रोध आदि नहीं खा सकते हैं ॥३४६॥
विशेष - ३५२ वीं साखी के नीचे उद्धृत नामदेवजी के शब्द की व्याख्या श्री दादूजी महाराज ने ३४६ से ३५२ तक साखियों में बताई है ।
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*सजीवन*
*दादू जीव अजा बिघ काल है, छेली जाया सोइ ।*
*जब कुछ बस नहीं काल का, तब मीनी का मुख होइ ॥३४७॥*
टीका - हे जिज्ञासुओं ! अविद्या युक्त जीव, बकरी के समान है और मृत्युरूप काल बघेरा है । वह बिघ = व्याघ्र = बघेरा रूपी काल, छेली(बकरी) रूप जीव के पूर्व जन्मों के विविध संस्कारों से ही बना है अर्थात् अविद्या में बँधे हुए जीव से ही काल उत्पन्न हुआ है । जब जीव मल, विक्षेप, आवरण के बन्धनों से मुक्त हो जाय और शुद्ध स्वरूप में आ जाय, तब उस काल - व्याघ्र का कोई काबू या वश नहीं चलता है और वह बिल्ली का सा मुख लिए रह जाता है ॥३४७॥
(क्रमशः)

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