गुरुवार, 3 जनवरी 2013

= परिचय का अंग =(४/३४८-५०)

॥दादूराम सत्यराम॥
*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"* 
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी 
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज 
*= परिचय का अंग - ४ =*
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*मन लवरू के पंख हैं, उनमनि चढै आकास ।*
*पग रहि पूरे साच के, रोपि रह्या हरि पास ॥३४८॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! पक्षीरूपी मन के ज्ञान वैराग्यमय पंख हैं और उनसे सर्व संसार के विषयों से उदासीन होकर आकाशवत् व्यापक ब्रह्मस्वरूप को प्राप्त होता है और सत्य की प्राप्ति के दृढ़ निश्चय रूपी पैर हरि के पास रोप कर स्थिर हो रहा है ॥३४८॥ 
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*तन मन वृक्ष बबूल का, कांटे लागे सूल ।*
*दादू माखण ह्वै गया, काहू का स्थूल ॥३४९॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! स्थूल सूक्ष्म शरीररूप संघात है, यह बबूल के पेड़ के समान है । इसमें सकाम कर्म और संशय, काम, क्रोध आदि कांटे लगे हैं । परन्तु उत्तम जिज्ञासुओं ने ही साधनों के द्वारा इन शरीरों का अध्यास त्याग कर, मन की चंचलता का निवारण करके, इनको मक्खनवत् दैवी सम्पदा के गुणों से युक्त बना लिये हैं । वे पुरुष सम्पूर्ण दुःखों से मुक्त हुए हैं ॥३४९॥ 
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*दादू संषा शब्द है, सुनहाँ संशा मारि ।*
*मन मींडक सूं मारिये, शंका सर्प निवारि ॥३५०॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! ब्रह्मवेत्ता सतगुरुओं का उपदेश तो सुस्सा(खरगोश) रूप है और शिष्य के हृदय में जो अनन्त प्रकार के संशय हैं, वही "सुनहाँ" = कुत्तारूप है, उसको गुरु के शब्दरूपी सुस्से ने मार दिया है । शुद्ध मन ही मेंढक है, उसने संशयरूपी सर्प को खा लिया है अर्थात् निष्काम हो गया है । आत्मज्ञानरूप शब्द, मिथ्या ज्ञान का निवारण करता है । यहाँ पर विपर्यय अर्थ का कारण यह है कि सतगुरु के उपदेश में संसारी मानव की सहज प्रवृत्ति सम्भव नहीं है ॥३५०॥
(क्रमशः)

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