॥दादूराम सत्यराम॥
*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"*
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज
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*= हैरान का अंग ६ =*
जरणा के अंग की साखी ४ में "दादू अदभुत देखिया............." इस सूत्र के व्याख्यान स्वरूप अब हैरान के अंग का निरूपण करेंगे । प्रथम आश्चर्य स्वरूप परमेश्वर की प्राप्ति के लिए मंगलाचरण करते हैं :-
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*दादू नमो नमो निरंजनं, नमस्कार गुरुदेवतः ।*
*वंदनं सर्व साधवा, प्रणामं पारंगतः ॥१॥*
टीका - हैरान स्वरूप निरंजनदेव को बारम्बार नमस्कार है और जो दिव्य मूर्ति सतगुरु हैरान स्वरूपी ब्रह्म का प्रत्यक्ष कराते हैं, उनको हमारी बारम्बार नमस्कार है । सर्व साधुओं को, जिनके सत्संग में हैरान स्वरूपी ब्रह्म का अनुभव करते हैं, उनको भी हम बारम्बार वंदना करते हैं । इस रीति से हरि - गुरु - संतों को प्रणाम करके आश्चर्यस्वरूप भगवान् के "पारंगत" कहिए, मर्म को प्राप्त करते हैं, अर्थात् साक्षात्कार करते हैं ॥१॥
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*रतन एक बहु पारिखू, सब मिल करैं विचार ।*
*गूंगे गहिले बावरे, दादू वार न पार ॥२॥*
टीका - हे जिज्ञासुओं ! जैसे व्यवहार में कोई अमोलक रत्न हो, तो अनेक जौहरी मिलकर विचार करके थक जाते हैं, किन्तु उसके मूल्य का कोई वार - पार नहीं पाकर गूंगे - गहिले हो जाते हैं । वैसे ही पूर्ण ब्रह्म अमोलक रत्न है, जिसको परखने वाले देव, पंडित, भक्त, सिद्ध आदिक हैं, परन्तु ब्रह्म - स्वरूप का कोई परमार्थ परिणाम नहीं पाकर ब्रह्म के अपार अद्वैत स्वरूप को विचार करके मुक्तजन उसमें गूंगे(अवाक्) और गहिले कहिए, तन्मय होकर बावरे यानी संसार से विरक्त(उदासीन) हो जाते हैं ॥२॥
वाल्मीकि बावल भये, गहि भये जड़ भरत ।
वामदेव गूंगे भये, सुंदर जान अरथ ॥
इक सांई अरु शून्य के, आदि अंत मध्य नांहि ।
शोधणहारे सब थके, जन रज्जब ता मांहि ॥
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*अनेक मतवादी*
*केते पारिख जौहरी, पंडित ज्ञाता ध्यान ।*
*जाण्या जाइ न जाणिए, का कहि कथिये ज्ञान ॥३॥*
टीका - हे जिज्ञासुओं ! राम - रत्न को परखने वाले जौहरीरूप अनेक पंडित सहदेव, ज्ञाता याज्ञवल्क्य, ध्यान करने वाले शेष जी और संतजन ब्रह्मतत्व का विचार कर - करके थक रहे हैं, किन्तु ब्रह्म का अमुक स्वरूप है, इस रीति से ब्रह्म का किसी ने भी पूर्ण स्वरूप नहीं जाना है । तात्पर्य यह है कि अनुभव द्वारा यद्यपि ब्रह्मतत्व जाना जाता है, किन्तु इन्द्रियों आदिक का विषय नहीं है, जिससे ब्रह्मतत्व के कथन या श्रवण के परिमाण में कथन और श्रवण भाव सम्भव नहीं है । अर्थात् ब्रह्मतत्व किसी इन्द्रियादि से गम्य हो तो उसका स्वरूप प्रतिपादन किया जा सकता है, किन्तु ब्रह्म तो अविषय निर्विकारी है, अतः ब्रह्म का कोई भेद नहीं पा सकता है ॥३॥
ऋषिभिर्बहुधा गीतं छन्दोभिर्विविधै: पृथक् ।
ब्रह्मसूत्र - पदैश्चैव हेतुमद्भिर्विनिश्चितै: ।
(क्रमशः)

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