शनिवार, 12 जनवरी 2013

= हैरान का अंग =(६/४-६)

॥दादूराम सत्यराम॥

*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"* 
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी 
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज 
*= हैरान का अंग ६ =*
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*केते पारिख पच मुये, कीमत कही न जाइ ।*
*दादू सब हैरान हैं, गूँगे का गुड़ खाइ ॥४॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! वेद और वेद के छः अंग व परमेश्वर के सनकादि भक्त नाना प्रकार से ब्रह्म का वर्णन करते हैं, परन्तु उसका पार नहीं पाया है । जैसे गूंगा पुरुष गुड़ खाकर नाना संकेत व प्रसन्नता आदि भाव दर्शाता है, परन्तु वाणी से उसकी मधुरता कह नहीं सकता । वैसे ही वेद, वेदांग भी "नेति नेति" कहकर लक्षणावृत्ति से प्रतिपादन करते हैं, किन्तु "यह है" इस रीति से कोई भी ब्रह्म - स्वरूप का प्रत्यक्ष ज्ञान नहीं करा सकते हैं ॥४॥ 
गूंगे खाई शर्करा, सुन्दर मन मुस्काइ ।
काँख पदावै सैंन दे, मुख सौं कही न जाइ ॥ 
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*सब ही ज्ञानी पंडिता, सुर नर रहे उरझाइ ।*
*दादू गति गोविन्द की, क्यों ही लखी न जाइ ॥५॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! अनेक पंडित, ज्ञानी, ध्यानी, मनुष्य, देव आदिक ब्रह्मतत्व का निर्णय करने में संलग्न हो रहे हैं, किन्तु गोविन्द की "गति" कहिए, समर्थाई को कोई भी प्रत्यक्ष नहीं करा सकते हैं । ब्रह्मतत्व प्रत्यक्ष आदि प्रमाणों से अगम्य है ॥५॥ 
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*जैसा है तैसा नाम तुम्हारा, ज्यों है त्यों कह सांई ।*
*तूं आपै जाणै आपको, तहँ मेरी गम नांहि ॥६॥* 
टीका - हे अपरम्पार ! आपके जैसे अपार अनन्त नाम हैं, वैसे ही आपका स्वरूप भी अपार अनन्त है । इस वास्ते आप अपने यथार्थ स्वरूप का अपने भक्तों को प्रत्यक्ष कराइये, क्योंकि आपकी जैसी अपार महिमा है, उसको आप ही जानते हो, तहाँ मेरी कुछ भी बुद्धि नहीं पहुँचती है । आपको अपना आत्म - स्वरूप जानने पर "मैं" कहिए, मेरे इस "अहम्" भाव को वहाँ कोई भी स्थान नहीं है । ऐसे अपने अनुपम स्वरूप को प्रत्यक्ष दिखाइये ॥६॥ 
(क्रमशः)

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