शुक्रवार, 11 जनवरी 2013

= जरणा का अंग =(५/३३-४)

॥दादूराम सत्यराम॥

*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"* 
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी 
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज 
*= जरणा का अंग - ५ =*
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*धारणा*
*पवना पानी सब पिया, धरती अरु आकास ।*
*चन्द सूर पावक मिले, पंचों एक ग्रास ॥३३॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! पवन का गुण विषयों में अनासक्ति, जल का गुण शीतलता, धरती का गुण क्षमा, आकाश का गुण असंगता, अग्नि का गुण तेजस्विता, चन्द्र का गुण सौम्यता, सूर्य का गुण भक्ति में शूरवीरता । सतगुरु कहते हैं ये गुण हमने ग्रासवत् धारण कर लिए हैं ॥३३॥ 
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*चौदह तीनों लोक सब, ठूंगे श्वासै श्वास ।*
*दादू साधू सब जरैं, सतगुरु के विश्वास ॥३४॥* 
इति जरणा का अंग संपूर्ण ॥ अंग ५ ॥ साखी ३४ ॥ 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! चौदह भवन और तीनों लोकों के सम्पूर्ण गुण हमने पूर्ण रूप से धारण किये हैं । गुण - औगुण, शीत - उष्ण, सुख - दुःख सब सहन किये हैं और पांचों इन्द्रियों के विषयों को भी एक ग्रासवत् ग्रहण कर लिया है और श्वास प्रतिश्वास में अखंड ब्रह्मानन्द के रस में तदाकार हो रहे हैं । परन्तु यह सब सतगुरु के उपदेश में विश्वास धारण करने से होता है अन्यथा जारणा करना बहुत कठिन कार्य है ॥ ३४ ॥ 
"वामा, विप्र, सु व्याध सौं, क्षमा करी, खल जान । 
जरणा अति मँहगी करी, अवतार हुँ डर आन ॥ "
दृष्टान्त - नर नारायण का तप भंग करने के लिये इन्द्र ने अप्सरायें(वामा) भेजी थीं, तब नर नारायण उससे नहीं डिगे और इन्द्र के अपराध को क्षमा करते हुये अपनी जंघा से उत्पन्न करके अत्यन्त सुन्दर अप्सरा उर्वशी इन्द्र को दी थी । ब्रह्मा विष्णु महेश इन तीनों में सबसे बड़ा विष्णु को सिद्ध करने के लिये भृगु ऋषि(विप्र) ने विष्णु की छाती में लात मारी थी । विष्णु ने भृगु ब्राह्मण को क्षमा करते हुए कहा था - ब्रह्मदेव ! आपके कोमल पाद - पद्म में मेरे वज्र वक्ष से चोट लगी हो तो मुझे क्षमा कर देना । यादव - वंश के विनाश के अनन्तर जब श्रीकृष्ण पीपल के वृक्ष के नीचे विश्राम कर रहे थे, तो जरा नामक व्याध ने हिरण के भरोसे उनके चरण में बाण मारा था । श्रीकृष्ण ने उसकी भूल पर क्षुब्ध न होकर उसे क्षमा कर दिया था । देखो इन अवतारों की जरणा शक्ति सहन शीलता और क्षमाशीलता, जो हम सबके लिये अनुकरणीय आदर्श बने हुए हैं !
छः प्रकार जरणा कही, श्री दयाल जी भाखि । 
घन आनन्द प्रकास रस, गुण परचा(इन्द्रिय) दृढ राखि ॥ 
इति जरणा का अंग टीका और द्रष्टांतों सहित सम्पूर्ण ॥ अंग ५ ॥ साखी ३४ ॥ 
(क्रमशः)

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