बुधवार, 9 जनवरी 2013

= जरणा का अंग =(५/३१-२)

॥दादूराम सत्यराम॥
*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"* 
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी 
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज 
*= जरणा का अंग - ५ =*
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*परमेश्वर की दयालुता*
*दादू एक बोल भूले हरि, सो कोई न जाणै प्राण ।*
*औगुण मन आणै नहिं, और सब जाणै हरि जाण ॥३१॥*
टीका - ब्रह्मऋषि दादूदयाल महाराज कहते हैं कि हे प्रभु ! आप एक वार्ता को तो मानो भूल ही गए हो, यद्यपि इस आपकी वार्ता को कोई भी प्राणधारी नहीं जानता है । वह वार्ता क्या है ? "औगुण मन आणै नहीं और सब जाणै हरि जाण" अर्थात् सर्व अन्तर्यामी रूप भाव से आप जीवों के सब गुण और अवगुणों को जानते हो परन्तु दया और जरणा रूप भाव से आप प्राणियों के अवगुणों को नहीं धारते हो ॥३१॥ 
मूसे साहिब ने कही, अन्न पूरण व्रत लेऊँ ।
मुई तीय संग देखकर, याको अन्न नहीं देऊ ॥
दृष्टान्त - 
एक दफा मूसा पैगम्बर खुदाताला के पास गए और बोले - आप सबको रोजी देते हो, खाने पीने को । यह काम मैं करूँगा । खुदाताला बोले - मूसा यह काम तो मेरा ही है । मूसा बोले - एक रोज तो आप मुझे देकर मेरी परीक्षा करो । खुदाताला बोले - अच्छा, कल सम्पूर्ण सृष्टि को खाने को तुम दे आना । 
जब मूसा अन्न पूरने चले, तो सबको पूरते - पूरते समुद्र के तट पर पहुँचे । वहाँ पर एक मरी हुई स्त्री के साथ राक्षसी प्रकृति वाला पामर पुरुष संसर्ग कर रहा था । मूसा बोले - इस काफिर को खाना नहीं दूँगा । खुदा के पास पहुँचे । खुदा ने पूछा - सबको पूर आए । बोला - हाँ, सबको पूर आया । खुदा बोले - एक समुद्र के किनारे रह गया । मूसा बोले - तोबा ! तोबा ! ऐसे काफिर को खाना नहीं देना चाहिए । उसका मर जाना ही ठीक है । खुदाताला बोले - मूसा ! तुम फेल हो गए । 
एक जीव का अवगुण देखकर तुमने खाना नहीं दिया । मैं तो सम्पूर्ण सृष्टि में जीवों के कदम - कदम पर अवगुणों को देखता हूँ । तुम्हारी तरह देखूं तो, यह सम्पूर्ण सृष्टि एक पल में नष्ट हो जाय । मूसा लज्जित हो गए । कहा भी है - "घट घट दादू कहि समझावै, 
जैसा करै सो तैसा पावै । 
कोई काहू का सीरी नाहीं, 
साहिब देखै सब घट मांही ॥"
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*सतगुरु अगम बात जानने के लिए विनय करते हैं*
*दादू तुम जीवों के औगुण तजे, सु कारण कौन अगाध ?*
*मेरी जरणा देख कर, मति को सीखें साध ॥३२॥*
टीका - ब्रह्मऋषि दादूदयाल महाराज परमेश्वर से प्रश्न करते हैं कि हे अगाध ! आप जीवों के अवगुणों को भूले रहते हो, इसका क्या कारण है ? परमेश्वर कहते हैं कि हे मेरे रूप ! इस मेरी जरणा कहिए, शान्ति, क्षमा आदिक को देखकर मेरे भक्त साधुजन भी इस वृत्ति को धारण करें ॥३२॥ 
औगुण ऊपर गुण करहिं, यही बड़ों की रीति । 
"रज्जब" जारहिं(जराते) विषय विष, गमे जगत सो जीति ॥ 
कवित्त
भले सूँ भलाई पाई, गिरिधर बताई तोहि, 
बुरे सूं बुरा करे सो कूकरा कहाई है । 
आप सूं बुरा जो तासूं, सदा ही भलाई करि, 
ताकी प्रभुताई तिहुँ लोक मांहि गाई है ॥ 
बड़ों की बड़ाई क्षमा, विसणूं दिखाई बीर, 
भृगु ऋषिराई जब लात की लगाई है । 
धन्य धन्य ताकी माई पिता हू बड़ाई पाई, 
ऐसो और कौन भाई ! राम की दुहाई है ॥ 
(क्रमशः)

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