शनिवार, 12 जनवरी 2013

= हैरान का अंग =(६/७-९)

॥दादूराम सत्यराम॥

*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"* 
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी 
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज 
*= हैरान का अंग ६ =*
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*केते पारिख अंत न पावैं, अगम अगोचर मांही ।*
*दादू कीमत कोई न जानै, खीर नीर की नांही ॥७॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! अपना आत्मस्वरूप ब्रह्म मन, वाणी से अगोचर है और जल - दूध की भाँति माया ब्रह्म की भिन्नता और नाम - नामी की महिमा का कोई भी पार नहीं पाता है । इसलिए जब परमेश्वर की कीमत किसी प्रकार से भी वर्णन करने में नहीं आती है, तो अब दूध और पानी की तरह परमेश्वर में अभेद हो जाओ ॥७॥ 
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*जीव ब्रह्म सेवा करै, ब्रह्म बराबर होइ ।*
*दादू जाणै ब्रह्म को, ब्रह्म सरीखा सोइ ॥८॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! जब यह जीवात्मा, निरावरण होकर अखंड ब्रह्म विचार में लगे और अहंग्रह उपासना द्वारा ब्रह्म का विचार करके मल - विक्षेप आवरण को दूर करे, तो यह ब्रह्म स्वरूप ही हो जाता है ॥८॥ 
"ब्रह्मविद् ब्रह्मैव भवति ।" - श्रुति
जो जाका सुमिरण करे, होइ ताहि का रूप । 
'सुन्दर' ब्रह्म विचार तैं, होइ है ब्रह्म स्वरूप ॥ 
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*वारपार को ना लहै, कीमत लेखा नांहि ।*
*दादू एकै नूर है, तेज पुंज सब मांहि ॥९॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! ब्रह्म के स्वरूप का कोई भी वार - पार आदि अंत नहीं पाता है और न कोई उसकी परीक्षा ही कर सकता है । ऐसे अद्वैत स्वरूप ब्रह्म का तेज - पुंज सम्पूर्ण प्राणियों में व्याप्त हो रहा है ॥९॥ 
(क्रमशः)

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