रविवार, 13 जनवरी 2013

= हैरान का अंग =(६/१०-१२)


॥दादूराम सत्यराम॥
*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"* 
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी 
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज 
*= हैरान का अंग ६ =*
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*पीव पिछान*
*हस्त पांव नहिं शीश मुख, श्रवण नेत्र कहुं कैसा ।*
*दादू सब देखैं सुनैं, कहै गहै है ऐसा ॥१०॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! उस परब्रह्म परमात्मा का स्वरूप अति आश्चर्यमय है, क्योंकि प्रभु के प्राकृतिक नेत्र तो हैं नहीं, परन्तु फिर भी वह सम्पूर्ण शुभ अशुभ कर्मों को देखते हैं । ऐसे ही परमेश्वर के श्रोत्र तो हैं नहीं, किन्तु अपने भक्तों की प्रार्थना को श्रवण करते हैं तथा बिना मुखारबिन्द के ही अपने भक्तों से वार्तालाप करते हैं और ऐसे ही हस्त, पाद आदि बिना ही अपने भक्तों की रक्षा करते हैं और उनका प्रति - पालन करते हैं । ऐसा ब्रह्म का हैरान - स्वरूप है ॥१०॥ 
अपाणिपादो जवनोग्रहीता 
पश्यत्यचक्षु: स श्रुणोत्यकर्ण: । 
स वेत्ति वेद्यं, न च तस्य वेत्ता, 
तमाहुरगर्यं पुरुषं महान्तम् ॥ 
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*"पाया पाया" सब कहैं, केतक "देहुँ दिखाइ ।"*
*कीमत किनहूँ ना कही, दादू रहु ल्यौ लाइ ॥११॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! अनेक संत, सिद्ध आदिक ब्रह्मस्वरूप का साक्षात्कार करके लक्षणावृत्ति द्वारा मुमुक्षुजनों को भी बोध कराते हैं, किन्तु चित्त - वृत्ति द्वारा किसी ने भी पार नहीं पाया है । इसलिये हे संतों ! उसी अपार ब्रह्मतत्व में अपनी चित्तवृत्ति को लयलीन करिये ॥११॥ 
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*अपना भंजन भर लिया, उहाँ उता ही जाण ।*
*अपणी अपणी सब कहैं, दादू बिड़द बखाण ॥१२॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! जैसे समुद्र से कोई एक या दो घड़े पानी के भर लावे, तो समुद्र की अनन्तता में कोई कमी नहीं आती है, इसी प्रकार ब्रह्म के ज्ञान - विचार द्वारा संतजन अपना आत्म - कल्याण करते हैं, परन्तु इस से ब्रह्म की अखण्डता और एकता में कोई कमी नहीं आती है । संतजन अपने - अपने अनुभव द्वारा उस परमेश्वर का "बिड़द" कहिए, यश का वर्णन करते हैं, किन्तु ब्रह्म के अपार, अनन्त, हैरान स्वरूप का किसी ने अन्त नहीं पाया है ॥१२॥ 
छप्यै छन्द
ध्रू प्रहलाद सुनन्द, व्यास शुकदेव सु नारद । 
शंकर सिध सनकादि, हनूं परीक्षित गुन सारद ॥ 
रिखब देव जैदेव, जनक जपहिं चतुरानन । 
गोरख दत्त बखान, नेति नित निगम पुरानन ॥ 
नाम कबीर अनन्त जन, श्री दादू भाख्यो अगम अति । 
पार न पावत "भीखजन", सबन कह्यो उनमान मति ॥ 
(क्रमशः)

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