॥दादूराम सत्यराम॥
*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"*
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज
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*= हैरान का अंग ६ =*
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*पार न देवै आपना, गोप गूझ मन मांहि ।*
*दादू कोई ना लहै, केते आवैं जांहि ॥१३॥*
टीका - हे जिज्ञासुओं ! अपार ब्रह्मतत्व का कोई भी पार नहीं पाया है क्योंकि वह समष्टि चैतन्य अपने अखंड स्वरूप में कहिए, अपनी स्वमहिमा में स्थित है और मन इन्द्रियों से अगम अगोचर है । अनेक योगीजन सहज समाधि द्वारा नाना प्रकार से ब्रह्म विचार कर - करके हैरान हो रहे हैं । कितने ही साधक पुरुष उसके स्वरूप में आकर अभेद हो रहे हैं और कितने ही सत्संग के द्वारा तन्मय होते जा रहे हैं, परन्तु उसका किसी ने भी अन्त नहीं पाया है ॥१३॥
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*गूंगे का गुड़ का कहूँ, मन जानत है खाइ ।*
*त्यों राम रसायन पीवतां, सो सुख कह्या न जाइ ॥१४॥*
टीका - हे जिज्ञासुओं ! जैसे गूंगा पुरुष गुड़ खाकर उसका रसास्वादन मन में जानते हुए भी वर्णन नहीं कर सकता है, उसी प्रकार व्यापक राम का दर्शनामृत पान करने में जो अलौकिक सुख उत्पन्न होता है, उसका लौकिक उपमाओं द्वारा मन इन्द्रियों से वर्णन नहीं किया जा सकता है ॥१४॥
समाधिनिर्धूतमलस्य चेतसो निवेशितात्मनि यत्सुखं भवेत् ।
न तद् गिरा वर्णयितुं समर्था स्वयं तदन्त:करेण गृह्यते ॥
इन्दव छन्द
होत विनोद जुतो अभिअन्तर,
सो सुख आपनो आपहि पैये ।
बाहिर कूँ उमग्यो पुनि आवत,
कंठ तैं सुन्दर फेरि पढैये ॥
स्वाद निवेरि निवेरयो न जात सु,
ज्यूं गुड़ गूंगहि जू नित खैये ।
क्या कहिये कहितैं न बने कछु,
जो कहिये, कहते हि लजैये ॥
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*दादू एक जीभ केता कहूँ, पूरण ब्रह्म अगाध ।*
*वेद कतेबां मित नहीं, थकित भये सब साध ॥१५॥*
टीका - हे जिज्ञासुओं ! उस पूर्ण ब्रह्म की अनन्त अपार महिमा है । जिसका प्रतिपादन कर - करके समस्त वेद - पुराण और संतजन थकित हो रहे हैं । मैं उसका क्या वर्णन कर सकता हूँ ?।१५॥
मत्तगयन्द
वेद थके कहि तन्त्र थके कहि,
ग्रंथ थके निसिवासुर गातें ।
शेष थके शिव इन्द्र थके पुनि,
खोज किये बहु भाँति विद्या तें ॥
पीर थके अरु मीर थके सब,
धीर थके बहु बोल गिरा तें ।
"सुन्दर" मौन गही सिध साधक,
कौन कहै उसकी मुख बातें ॥
(क्रमशः)

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