*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"*
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज
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*= हैरान का अंग ६ =*
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*दादू मेरा एक मुख, कीर्ति अनन्त अपार ।*
*गुण केते परिमित नहीं, रहे विचार विचार ॥१६॥*
टीका - हे जिज्ञासुओं ! उस परमेश्वर के अनन्त अपार स्वरूप का विचार कर - करके, सभी भक्त लोग हैरान हैं । मैं अपने एक मुँह से उसका क्या वर्णन कर सकता हूँ ? उसकी महिमा और गुण अपार हैं ॥१६॥
शेष सहस्त्र द्वै रसन सूं, लेत जुदो जुदो नांव ।
"जगन्नाथ" नवतम सदा, अति अचरज बलि जांव ॥
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*सकल शिरोमणि नाम है, तूं है तैसा नांहि ।*
*दादू कोई ना लहै, केते आवैं जांहि ॥१७॥*
टीका - हे प्रभु ! सर्व साधनों में श्रेष्ठ आपकी प्राप्ति कराने वाला आपका नाम स्मरण है । हे स्वामी ! आप अनन्त स्वरूप हो, वैसे ही आपके नाम भी अनन्त हैं । अतः अनन्तनामी अर्थात् अनामी कहे जाते हो । आपके भक्तजन किसी नाम का आधार लेकर आपका नाम स्मरण करते हुए आप में अभेद हो जाते हैं, किन्तु आपका अन्त नहीं पाते हैं । कितने ही मुक्तजन आपके स्वरूप में अभेद हो रहे हैं और कितने ही साधक पुरुष नित्य - अनित्य का विचार करते हुए आपके स्वरूप की ओर आ रहे हैं ॥१७॥
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*दादू केते कह गये, अंत न आवै ओर ।*
*हमहूँ कहते जात हैं, केते कहसी होर ॥१८॥*
टीका - हे जिज्ञासुओं ! उस परमेश्वर के अपार स्वरूप का और उसके अनन्त नामों का कोई भी पुरुष अन्त नहीं पाते हैं, क्योंकि अनन्त ही युग - युगान्तरों में उसके भक्तजन - ब्रह्म विचार और नाम - स्मरण से ब्रह्मरूप हो गए हैं और हमारा भी तुमको उस ब्रह्म के विषय में यही उपदेश है तथा भविष्य में भी अगणित संतजन उस ब्रह्मतत्व का ऐसा भी प्रतिपादन करेंगे । किन्तु इसमें ब्रह्म की अखंडता में किंचित् भी न्यूनता संभव नहीं है अर्थात् वह ब्रह्मतत्व अखंड अविनाशी है और अणु - अणु में व्यापक है ॥१८॥
किनहुँ पार न पाइयो, अब पावै कहि कौन ।
सुन्दर आगे होहिंगे, थाकि रहे करि गौन ॥
(क्रमशः)

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