॥दादूराम सत्यराम॥
*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"*
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज
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*= हैरान का अंग ६ =*
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*दादू मैं क्या जानूँ क्या कहूँ, उस बलिये की बात ।*
*क्या जानूँ क्यों ही रहै, मो पै लख्या न जात ॥१९॥*
टीका - हे जिज्ञासुओं ! उस परब्रह्म परमेश्वर के विषय में मैं क्या जान सकता हूँ और क्या वर्णन कर सकता हूँ क्योंकि वह सर्वशक्तिमान है । न मालूम, वह कैसे रहते हैं ? उनकी गति, महिमा, शक्ति, भक्त - वत्सलता, पतित - पावनता आदिक गुणों को मैं क्या समझूं ? उनकी अगम अगाध लीला है ॥१९॥
यस्यामतं तस्य मतं, मतं न यस्य वेद स: ।
अविज्ञातं विजानतां विज्ञातमविजानताम् ॥
जब लग जीव जाण्या कहै, तब लग कछु न जाण ।
जन रज्जब जाण्या तबै, जो जाण रु भये अजाण ॥
देख गर्व प्रह्लाद को, हरि धार्यो द्विज रूप ।
डारी डांग धरणि पर, बल हर लीनो भूप ॥
दृष्टान्त - प्रह्लाद का गर्व देखकर भगवान् विष्णु ब्राह्मण का रूप बनाकर आये और प्रह्लाद से बोले - मैंने सुना है, आप विष्णु से युद्ध करने जा रहे हो ? मेरा भी वह विष्णु शत्रु है, क्योंकि मेरे सारे परिवार को उसने खत्म कर दिया । मैं भी उससे बदला लूंगा । प्रह्लाद बोला - ठीक है । ब्राह्मण बोले - आपकी कितनी ताकत है ? प्रह्लाद बोले - तेरे में कितनी ताकत है ? तब ब्राह्मण ने अपने हाथ से लकड़ी जमीन पर डाल दी और बोले - मेरी ताकत तो मेरी लाठी है । तूं इसको उठा ले । मैं जान लूंगा कि विष्णु से तूं युद्ध मेरे साथ चलकर कर सकता है । प्रह्लाद उठे और लकड़ी को उठाने लगे । लकड़ी नहीं उठी । प्रह्लाद को विचार हुआ कि हो न हो, यह तो भगवान् विष्णु हैं । तब भगवान् की स्तुति करने लगे । भगवान् प्रगट हो गए । प्रह्लाद बोला - मेरा अपराध क्षमा करो । मैंने शुक्राचार्य के कहने से आपसे लड़ने और पिता का बदला लेना चाहा । भगवान् बोले - भाई, तूं क्षमा कर । तूं हमारे ऊपर ही शस्त्र चलाना चाहता है ? प्रह्लाद का गर्व दूर हो गया और बोला - हे नाथ ! आप सर्व - शक्तिमान हो । आपकी शक्ति का किसी ने पार नहीं पाया । आपकी जय हो !
इन्द्रादिक गरबे अमर, तब हरि धर यक्ष रूप ।
वायु अग्नि गये देखने, लज्जित भये सुर भूप ॥
(अमर = देवता)
दृष्टान्त - एक समय स्वर्ग में इन्द्र और सभी देवताओं ने सभा की कि हम सभी अपने अपने लोक के राजा हैं । विष्णु को हम अपना स्वामी क्यों मानें ? तब भगवान् ने देखा देवता मेरा अस्तित्व मिटा रहे हैं । तब भगवान् यक्ष का रूप धारण कर स्वर्ग के दरवाजे पर आ बैठे । इन्द्र के हुकम से वायु देवता गया । बोला - उठ जा यहाँ से, नहीं तो उड़ा कर टुकड़े - टुकड़े कर दूँगा । यक्षरूप भगवान् ने एक तिनका रख दिया और बोले - इसको उड़ा दे । वायु देवता से वह तिनका नहीं उड़ा । इसी प्रकार अग्निदेव गया, वरुणदेव गया । सभी ने अपना - अपना जोर लगाया, तिनका ज्यूं का त्यूं रखा रहा । तब इन्द्र के सहित सारे देवता आकर यक्ष भगवान् की स्तुति करने लगे और बोले - हे नाथ ! हमारा अपराध क्षमा करो । तब भगवान् बोले - हे इन्द्र ! आप लोग क्षमा करो, जो मेरा अस्तित्व और मेरी पूजा ही मिटा रहे हो । यह सुन कर सभी देवगण लज्जि होकर नतमस्तक हो गए ।
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*दादू केते चल गये, थाके बहुत सुजान ।*
*बातों नाम न नीकले, दादू सब हैरान ॥२०॥*
टीका - हे जिज्ञासुओं ! अनन्त संतजन ब्रह्म विचार कर - करके ब्रह्मस्वरूप हो गये और अगणित पंडित ब्रह्म का निर्णय कर - करके थक गए, किन्तु वाणी द्वारा उस अकह ब्रहमतत्व का कोई भी प्रतिपादन नहीं कर सकते हैं । वहाँ नाम रूप की कोई गम नहीं है । ब्रह्म के अगम अगोचर स्वरूप को विचार - विचार करके सभी हैरान हैं ॥२०॥
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*ना कहीं दिट्ठा ना सुण्या, ना कोई आखणहार ।*
*ना कोई उत्थों थी फिर्या, ना उर वार न पार ॥२१॥*
टीका - हे जिज्ञासुओं ! न तो कहीं परमेश्वर को देखा है, न किसी से उसका स्वरूप ही सुना है और न कोई उस अकह तत्व को कहने वाला ही है, क्योंकि "उत्थों थी" = वहाँ से ब्रह्मतत्व में स्थिर होकर कोई भी व्यवहार - काल में नहीं आया है, जिससे हम उस परमपद का वृत्तान्त पूछ सकें । इस रीति से उसका कोई भी आदि, अंत और पार नहीं पाया है ॥२१॥
कबीर मारग कठिन है, कोई न सकहि जाइ ।
गये ते बाहुरे नहीं, कुशल कहै को आइ ॥
(क्रमशः)

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