मंगलवार, 15 जनवरी 2013

= हैरान का अंग =(६/२२-२४)


॥दादूराम सत्यराम॥
*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"* 
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी 
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज 
*= हैरान का अंग ६ =*
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*परमार्थ स्वरूप*
*नहिं मृतक नहिं जीवता, नहिं आवै नहिं जाइ ।*
*नहिं सूता नहिं जागता, नहिं भूखा नहिं खाइ ॥२२॥* 
*न तहाँ चुप ना बोलणां, मैं तैं नांहीं कोइ ।*
*दादू आपा पर नहीं, न तहाँ एक न दोइ ॥२३॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! वह परमेश्वर अखण्ड है, अविनाशी है । उसको प्राप्त होने वाले संत भी न मरते हैं, न जन्मते हैं, न वे आते हैं, न वे जाते हैं । न अनात्म पदार्था की उनको इच्छा होती है, न उनको भोगते ही हैं । न वे अज्ञान में सोते हैं और न वह संसार की चतुरता में जागते ही हैं ॥२२॥ 
हे जिज्ञासुओं ! उस ब्रह्म चैतन्य के परमार्थ रूप में न तो चुप ही रहना पड़ता है, न बोलना ही बनता है; न मैं है, न तूं है; न और है; न अपना है न पराया; न वहाँ एक ही है, न वहाँ दो ही कहना बनता है । तात्पर्य यह है कि निरुपाधिक अद्वैत, सर्वसाक्षी, समष्टि चैतन्य निश्चल है । इसलिए भाव अथवा अभाव रूप से ब्रह्म का कोई भी निरूपण नहीं कर सकता है अर्थात् वह अवाच्य है ॥२३॥ 
न जायते म्रियते वा कदाचित् 
नायं भूत्वा भविता वा न भूय: । 
अजो नित्य: शाश्वतोSयं पुराणो 
न हन्यते हन्यमाने शरीर ।(गीता)
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*एक कहूँ तो दोइ हैं, दोइ कहूँ तो एक ।*
*यों दादू हैरान है, ज्यों है त्यों ही देख ॥२४॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! कदाचित् हम मुक्तजन, ब्रह्म को एक कहैं तो माया और ब्रह्म दो प्रतीत होते हैं, इसलिए वक्तृत्व और वक्ताभाव से द्वैतभाव होता है और जो दो कहैं तो अनिर्वचनीय ब्रह्म एक अद्वैत है, माया और वक्ता मिथ्या रूप हैं तथा वह विचार करने से ब्रह्म की सत्ता से ही प्रतीत होते है । इस प्रकार ब्रह्म के अद्भुत स्वरूप को विचार - विचार कर हम अति हैरान हैं । इसलिए अपने सहज स्वरूप को पहचानिये ॥२४॥ 
छप्पय
आदि नारायण अमर, वेद भागोत सु बोलहिं । 
विविध भाँति वपु धारि, हारि जग मांहि न डोलहिं ॥ 
द्वै द्वै गुण सूं रहित, भले सिध साधक भाखहिं । 
पूरे पुरुष पिछान, रति मति तासूं राखहिं ॥ 
साचे थापहिं साच नित, रज्जब रीति विचारिये । 
परम पंथ प्राणी चलहु, रहते की रह धारिये ॥ 
(क्रमशः)

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