मंगलवार, 15 जनवरी 2013

= हैरान का अंग =(६/२५-२७)

॥दादूराम सत्यराम॥
*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"* 
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी 
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज 
*= हैरान का अंग ६ =*
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*देख दीवाने ह्वै गए, दादू खरे सयान ।*
*वार पार कोई ना लहै, दादू है हैरान ॥२५॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! जो मुक्तजन ब्रह्म अनुभव करके स्वस्वरूप में "दीवाने" कहिए, मस्त रहते हैं, वे माया प्रपंच से निर्लिप्त होकर "सयान" कहिए, वे चतुर आत्मस्वरूप को प्रत्यक्ष कर लेते हैं, परन्तु अनन्त अपार ब्रह्मस्वरूप का कोई अन्त नहीं पाते हैं ॥२५॥ 
ध्यान थकित ईश्वर भये, ब्रह्मा वेद पढंत । 
हरि हारे अवतार धर, लहै न अविगति अंत ॥ 
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*पतिव्रत निष्काम*
*दादू करणहार जे कुछ किया, सोई हौं कर जाण ।*
*जे तूं चतुर सयाना जानराइ, तो याही परमाण ॥२६॥* 
टीका - हे वादी ! जो कुछ करणहार परमेश्वर ने बनाया है, वही मैं हूँ, ऐसा जानो । हे भाई ! यदि तूं चतुर, सयाना और जानराय कहलाता है, तो यहाँ यही प्रमाण है कि अब उसी में वृत्ति लगाइये । अर्थात् नाम रूप अनन्त माया प्रपंच का विस्तार करके करणहार छिप रहा है । अब माया प्रपंच की यथार्थता का निर्णय करके निश्चय करने में ही जीवन की सार्थकता है ॥२६॥ 
वादी पूछी कौन हो, गुरु दादू को आइ । 
या साखी उत्तर दियो, समझि गयो सुख पाइ ॥ 
प्रसंग - एक पुरुष ब्रह्मऋषि के पास आकर पूछने लगा कि आप कौन हो ? पूर्वोक्त साखी से गुरुदेव ने उत्तर दिया । फिर बोला - इस सृष्टि की परमेश्वर ने अनेकों रूपों में उत्पत्ति क्यों की ? निम्न साखी से उत्तर दिया ।
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*दादू जिन मोहनि बाजी रची, सो तुम्ह पूछो जाइ ।*
*अनेक एक तैं क्यों किये, साहिब कहि समझाइ ॥२७॥* 
इति हैरान का अंग सम्पूर्ण ॥ अंग ६ ॥ साखी २७ ॥ 
टीका - हे भाई ! जिस परमात्मा ने यह मायारूप मोहनी बाजी सृष्टि रची है, उसी से तुम पूछो - "हे साहब ! तुम तो एक हो, परन्तु यह अनेक रूप आपने क्यों बनाए हैं ? हे ईश्वर ! आप इस भेद को समझा कर कहो ।" तो वही बताएँगे । अथवा ब्रह्मऋषि कहते हैं कि हे साहब ! पूर्वोक्त भेद को आप ही समझा कर कहो । हम तो आपकी इस लीला को देखकर हैरान व अचंभित हैं ॥२७॥ 
प्रसंग :- 
इक वादी संसार की, उत्पत्ति पूछी आइ । 
जासे उत्तर वाको दिया, या साखी समझाइ ॥ 
जिस प्रभु ने यह अविद्या - कृत रचना रची है, उसी परमेश्वर को सर्व - व्यापक करके जानो और अपने अद्वैत स्वरूप को बिसार कर नानात्व जगत प्रपंच में क्यों आसक्त हो रहे हो ? इसलिए परमेश्वर के नित्य अद्वैत स्वरूप को मन में विचार कर धारण करो अर्थात् हैरान स्वरूपी ब्रह्म में निश्चय वृत्ति लगाकर तद्रूप हो जाओ ।
इति हैरान का अंग टीका और दृष्टान्तों सहित सम्पूर्ण ॥ अंग ६ ॥ साखी २७ ॥
(क्रमशः)

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