बुधवार, 16 जनवरी 2013

= लै का अंग =(७/१-३)

॥दादूराम सत्यराम॥
*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"* 
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी 
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज 
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"दादू रहु ल्यौ लाइ." इस सूत्र के व्याख्यान स्वरूप ब्रह्मतत्व को जानने के लिए अब लय के अंग का निरूपण करते हैं ।
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*दादू नमो नमो निरंजनं, नमस्कार गुरुदेवतः ।*
*वन्दनं सर्व साधवा, प्रणामं पारंगतः ॥१॥* 
टीका - उस निरंजन देव को हम बारम्बार नमो नमो करते हैं, जो आप अनुग्रह करके भक्तों की अपनी लयभक्ति में एकाग्र करते हैं और लय भक्ति के उपदेष्टा सतगुरुओं को भी हमारा नमस्कार है और सर्व साधु, जो लय भक्ति में दृढ़ता कराते हैं, उन सबको हमारी वन्दना है । इस रीति से हरि, गुरु, संतों को नमस्कार करजिज्ञासुजन परमेश्वर के अपार स्वरूप में लय होते हैं ॥१॥ 
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*लय का स्वरूप लक्षण*
*दादू लै लागी तब जाणिये, जे कबहुँ छूट न जाइ ।*
*जीवत यों लागी रहै, मूवां मंझ समाइ ॥२॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! जो सुरति निरन्तर ब्रह्म में अखण्ड एकरस बनी रहे और कभी भी अलग नहीं होवे, तो समझिये कि मेरी अब परमात्मा में लय लगी है । जब तक देह प्राणों का संयोग है, तब तक पूर्वोक्त प्रकार से अखंड ब्रह्म वृत्ति में ही स्थिर रहो और देह प्राणों के विसर्जन होने पर उसमें अभेद होइये ॥२॥ 
"लयो लय इति प्राहु: कीदृशं लयलक्षणम् । 
अपुनर्वासनोत्थानात् लयो विषय - विस्मृति ।
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*दादू जे नर प्राणी लै गता, सोई गत ह्वै जाइ ।*
*जे नर प्राणी लै रता, सो सहजैं रहै समाइ ॥३॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! जो प्राणी नर - तन पाकर भी परमेश्वर की भक्ति से शून्य है, उनका मनुष्य - जीवन व्यर्थ ही व्यतीत होता है और जो प्राणी नर - तन पाकर परमेश्वर में लय भक्ति द्वारा तदाकार होते हैं, वे मुक्तजन सहजभाव से ही स्वस्वरूप में लय रहते हैं ॥३॥ 
(क्रमशः)

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