*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"*
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज
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*= लै का अंग ७ =*
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*सब तज गुण आकार के, निश्चल मन ल्यौ लाइ ।*
*आत्म चेतन प्रेम रस, दादू रहै समाइ ॥४॥*
टीका - हे जिज्ञासुओं ! शरीर आदिक माया प्रपंच के सब गुण व सांसारिक व्यावहारिकता को त्यागकर मन को निश्चल करके लय में लगाइये । इस प्रकार से यह जीवात्मा अपने चैतन्य स्वरूप के प्रेम - रस में रत्त होकर सहज स्वरूप में अभेद होता है ॥४॥
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*तन मन पवना पंच गह, निरंजन ल्यौ लाइ ।*
*जहँ आत्म तहँ परमात्मा, दादू सहज समाइ ॥५॥*
टीका - हे जिज्ञासुओं ! तन, मन, श्वास और इन्द्रियों को निग्रह करके निरंजन में लय लगाइये और अपने व्यष्टि चैतन्य को समष्टि चैतन्य में अभेद करके सहज स्वरूप में मग्न हो जाइये ॥५॥
"प्रनष्टश्वास नि:श्वास: प्रध्वस्तविषयग्रह: ।
निश्चेष्टो निर्विकारश्च लयो जयति योगिनाम् ॥
- हठ दीपिका
ज्ञेयवस्तुपरित्यागाद् विलयं याति मानसम् ।
मनसो विलये जाते कैवल्यमवशिष्यते ॥"
- हठ दीपिका
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*अर्थ अनुपम आप है, और अनर्थ भाई ।*
*दादू ऐसी जानि कर, तासौं ल्यौ लाई ॥६॥*
टीका - हे जिज्ञासुओं ! एक परमेश्वर ही अनुपम कल्याण स्वरूप है शेष माया प्रपंच तो अनर्थ का स्वरूप है । इस प्रकार यह दृढ़ निश्चय करके एक परमेश्वर के स्वरूप में ही लय लगाओ ॥६॥
अर्थ सुभग जगदीश है, ता चरणन ल्यौ लाइ ।
"तुलसी" ताके भजन में, यहाँ आगे सुख पाइ ॥
(क्रमशः)

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