गुरुवार, 17 जनवरी 2013

= लै का अंग =(७/७-९)

॥दादूराम सत्यराम॥
*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"* 
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी 
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज 
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*लै लगाने की विधि*
*ज्ञान भक्ति मन मूल गह, सहज प्रेम ल्यौ लाइ ।*
*दादू सब आरंभ तजि, जनि काहू संग जाइ ॥७॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! सब इन्द्रियों के मूल कारण मन को ज्ञान, भक्ति द्वारा एकाग्र करिये और फिर निर्द्वंद निष्काम प्रेम के द्वारा लय लगाओ । बाकी सब बहिरंग साधनों को छोड़ दो । किसी भी सकाम कर्म के साथ मत जाओ ॥७॥ 
ज्ञेयं सर्वं प्रतीतं च ज्ञानं च मन उच्चयते । 
ज्ञानं ज्ञेयं समं नष्टम नान्य: पन्था द्वितीयक: ॥ 
सभी प्रतीत पदार्थ मन के स्वरूप हैं । अत: इनसे मन को हटाकर ज्ञान और प्रेमभक्ति ही परमेश्वर प्राप्ति का साधन है, इन्हें छोड़कर अन्य कोई दूसरा मार्ग नहीं ।
"कदापि युवतिं भिक्षुर्न स्पृशेद् दारवीमपि । 
स्पृशन् करीव बध्यते करिण्या अंगसंगत: ॥"
भिक्षुक को लकड़ी की बनी स्त्री मूर्ति का भी स्पर्श नहीं करना चाहिये । कागज की बनी हथिनी पर आसक्त होने से ही हाथी बन्धन में पड़ता है ।
फकीर सूँ औरत कही, मो चूड़ी पहनाइ । .
रात किया संकल्प बहु, प्रात दई कुतकाइ ॥ 
दृष्टान्त - एक फकीर दरगाह में रहते थे । एक औरत झाडू सफाई दरगाह में किया करती थी और वहीं रहती थी । फकीर के द्वारा उसका पालन - पोषण होता था । एक रोज वह कुएँ पर पानी लेने गई । औरतें कहने लगीं, "तूं कहाँ रहती है ?" "मैं दरगाह में ।" "अब तो तूं फकीर की चूड़ी पहन ले ।" वह भोली थी, इसमें कुछ समझ नहीं पाई । वह फकीर से बोली - सांई, मुझे भी चूड़ी पहना दो । सांई बोले - "पहना देंगे ।" फिर सांई रात को विचार करने लगे कि चूड़ी पहनाने का क्या अर्थ होगा ? फिर यह सोचा कि यह तो कुसंग है । सवेरे ही उसको दरगाह से मुक्त कर दिया और बोले - "और ही कहीं जाकर तुम चूड़ी पहनो ।" इसलिए भक्त को परमेश्वर के नाम के अतिरिक्त सभी आरम्भ त्याग देने चाहिए ।
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*अगम संस्कार*
*पहली था सो अब भया, अब सो आगे होइ ।*
*दादू तीनों ठौर की, बूझै बिरला कोइ ॥८॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! पूर्व जन्म के कर्मानुसार तो यह जीव अब संसार - चक्र में पड़ा हुआ है और फल भोगता है । अब जो कर्तव्य कर्म कर रहा है, तदनुसार भविष्य में संसार - चक्र में घूमेगा और फल भोगेगा । किन्तु भूत, भविष्य, वर्तमान का विचार करके कोई विरला ही साधक लय मार्ग में प्रवृत्त होता है ॥८॥ 
कही बादशाह बीरबल, च्यार चीज दिखलाह । 
इत उत दोउ जगां नहीं, जन वेश्या कट साह ॥ 
दृष्टान्त - एक रोज बादशाह बीरबल से बोला - बीरबल चार चीज दिखलाओ, "यहाँ है और वहाँ नहीं", "वहाँ है और यहाँ नही", "यहाँ भी है और वहाँ भी है", "यहाँ भी नहीं और वहाँ भी नहीं ।' बीरबल ने एक तो साहूकार को बुलाया जो खूब धर्म - पुण्य किया करता था । एक बादशाह की वैश्या को । एक संत को । एक लकड़ी काट कर बेचने वाले को । चारों को साथ लेकर बादशाह के दरबार में बीरबल पहुँच गए । बादशाह बोला - बीरबल, वे चीज ले आए ? "हाँ हजूर, ले आया ।" "कहाँ हैं ?" चारों को बीरबल ने लाईन में खड़ा कर दिया । बादशाह बोला - "कहाँ हैं ?" "ये खड़े ।" "ये तो मनुष्य हैं ?" "मनुष्यों में ही होती हैं वे चीजें" । "बतलाओ" । बीरबल ने कहा कि आप प्रश्न करो ।
बादशाह बोला - "वहाँ है और यहाँ नहीं," "यह महात्मा यहाँ दुनिया में नहीं के बराबर हैं, परमात्मा के दरबार में इनकी गणना है ।" बादशाह - "यहाँ है और वहाँ नहीं ?" "यह आपके दरबार की वैश्या । आपको बोल दे कि आप खड़े हो जाओ तो आप भी खड़े हो जाओगे । इस का अस्तित्व यहाँ है, खुदा के दरबार में नहीं है । वहाँ इसके इतने जूते लगेंगे कि वहाँ गिनने वाला नहीं मिलेगा ।"
बादशाह - "वहाँ भी है और यहाँ भी है ?" "यह साहूकार, इसकी कीर्ति यहाँ भी है और खुदा के वहाँ भी है ।" बादशाह "यहाँ भी नहीं, वहाँ भी नहीं ?" "यह कठियारा । यह दोनों जगह नहीं है । न कुछ पहले धर्म - पुण्य किया और न अब करता है । संसार में मनुष्य जैसा करता है, वैसा ही फल उसे लोक - परलोक में मिलता है ।"
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*अध्यात्म*
*योग समाधि सुख सुरति सौं, सहजैं सहजैं आव ।*
*मुक्ता द्वारा महल का, इहै भक्ति का भाव ॥९॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! लय योग के द्वारा सुरति को लगाओ और सहजावस्था को प्राप्त होओ । इस प्रकार धीरे - धीरे अभ्यास द्वारा परमेश्वर की तरफ में लगाओ । यह मनुष्य देह मुक्तिरूपी महल का दरवाजा है । इस प्रकार परमेश्वर में भाव सहित प्रेमा भक्ति द्वारा लय लगाओ ॥९॥
(क्रमशः)

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