*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"*
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज
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*= लै का अंग ७ =*
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*सहज शून्य मन राखिये, इन दोनों के मांहि ।*
*लै समाधि रस पीजिये, तहाँ काल भय नांहि ॥१०॥*
टीका - हे जिज्ञासुओं ! योग में तो मन को निद्र्वन्द्व कहिए, निर्विकल्प स्वरूप बना कर स्वस्वरूप में स्थिर करिये, किन्तु परमेश्वर में लय रूप समाधि द्वारा स्थिरता करके भक्ति द्वारा भगवद् दर्शन रूप अमृत का पान करिए । वहाँ फिर किसी भी प्रकार के काल का भय नहीं रहता । तात्पर्य यह है कि तत्वबोध लक्ष्य तो योग का भी वही है, किन्तु भक्तिरूप लय का मार्ग सुगम है ॥१०॥
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*दादू बिन पायन का पंथ है, क्यों कर पहुँचै प्राण ।*
*विकट घाट औखट खरे, मांहि शिखर असमान ॥११॥*
टीका - हे जिज्ञासुओं! आत्म प्राप्ति का मार्ग बिना पैरों का है, इन पैरों से नहीं चला जाता है । यह प्राणधारी किस प्रकार पहुँचे और फिर रास्ता बड़ा टेढ़ा, बांका है । रास्ते में काम, क्रोध, लोभ मोह के बड़े - बड़े पहाड़ खड़े हैं । जैसे बाहर हिमालय की चोटी आकाश को चूम रही है, इसी प्रकार परमात्मा की प्राप्ति के मार्ग में भी, ये बड़े - बड़े अर्थात् अहंकार आदि पहाड़ खड़े हैं ॥११॥
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*मन ताजी चेतन चढै, ल्यौ की करै लगाम ।*
*शब्द गुरु का ताजणा, कोई पहुँचै साधु सुजान ॥१२॥*
टीका - हे जिज्ञासुओं ! जैसे बाहर बद्री, केदार आदि तीर्थों में जाने के लीए पहाड़ी घोड़े पर सवारी करते हैं, इसी प्रकार आत्मस्वरूप परमात्मा की प्राप्ति के लिए भी परोक्त साखी में जो पहाड़ बतलाए, उनसे पार होने के लिए मन रूपी ताजी घोड़ा है और उसके लय रूपी लगाम लगाओ और गुरु का शब्द रूपी ज्ञान का हन्टर मारो । फिर इस घोड़े पर सवारी करो । तभी सच्चे सुजान जिज्ञासु, इस प्रकार परमेश्वर को प्राप्त कर लेते हैं ॥१२॥
(क्रमशः)

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