॥दादूराम सत्यराम॥
*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"*
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज
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*= लै का अंग ७ =*
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*सूक्ष्म मार्ग*
*किहिं मारग ह्वै आइया, किहिं मारग ह्वै जाइ ।*
*दादू कोई ना लहै, केते करैं उपाइ ॥१३॥*
टीका - हे गुरुदेव ! आप कृपा करके बतलाओ कि किस मार्ग से तो यह जीव संसार में आता है और किस मार्ग से परलोक में जाता है ? हे सतगुरो ! इस बात को कोई भी नहीं जान पाते हैं और यह अज्ञानी मानव सकाम कर्मरूपी उपाय कहिए, साधन कितने ही प्रकार के करता रहता है ॥१३॥
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*शून्य हि मार्ग आइया, शून्य हि मारग जाइ ।*
*चेतन पैंडा सुरति का, दादू रहु ल्यौ लाइ ॥१४॥*
टीका - हे जिज्ञासुओं ! शून्य कहिए कर्मरूपी मार्ग से ही तो यह जीव इस संसार में आता है और कर्म रूपी मार्ग से ही जाता है और परमात्मा की प्राप्ति का मार्ग तो सुरति का है । इसलिए हे मुमुक्षुओं ! अपनी सुरति कहिए, वृत्ति लय मार्गं के द्वारा परमात्मा में स्थित करो ॥१४॥
एक अज्ञता मूल है, जन्म मरण का बीर ।
ताकूँ छाडै हरि रटै, वाकूं नाहिं सरीर ॥
एक फकीर और बादशाह, सुरति ही मक्कै जाइ ।
हेठ पड़े अरु अधर के, बेर दिखाये खाइ ॥
दृष्टान्त - एक बादशाह फकीर के दर्शन करने रोज जाया करता था । वह फकीर रोजाना सुरति के द्वारा मक्का शरीफ जाकर दर्शन किया करते थे और बादशाह भी सुरति के द्वारा रोज मक्का शरीफ जाकर नमाज गुजारता । एक रोज बादशाह पहले मक्का शरीफ जाकर वापिस लौट कर आ रहे थे । रास्ते में एक बेर की झाड़ी पकी हुई थी और पके हुए बेर नीचे पड़े थे । चार बेर बादशाह ने उठा लीये । विचार किया कि यह फकीर के चल कर नजर करूँ गा । उस रोज फकीर देर से मक्का शरीफ गए । जब लौटे, तो रास्ते में उसी झाड़ी के पास आकर खड़े हुए और देखा यहाँ से बादशाह चार बेर नीचे के उठा कर ले गया है । फकीर ने चार बेर ऊपर के तोड़ लिए और अपने तकिया पर आ गए । जब बादशाह फकीर का दीदार करने गया, चार बेर रखकर नमस्कार किया । बादशाह बोला - हजरत ! यह मक्का शरीफ के बेर हैं । मैं रोजाना मक्का शरीफ सुरति द्वारा जाकर नमाज गुजारता हूँ । बादशाह यह समझता था कि फकीर मक्का शरीफ नहीं जाते हैं । तब फकीर ने चार बेर अपने आसन के नीचे से निकाले और बादशाह से बोले - ये खाओ । ये मक्का शरीफ के बेर हैं । ये बेर उसी झाड़ी से तोड़े हुए हैं । आपके बेर नापाक हैं, क्योंकि नीचे से लाए हो । यह सुनते ही बादशाह का अहंकार दूर हो गया और फकीर के कदमों में नमस्कार किया । सतगुरुदेव कहते हैं कि परमात्मा की प्राप्ति का मार्ग तो लय रूप सुरति का है ।
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*दादू पारब्रह्म पैंडा दिया, सहज सुरति लै सार ।*
*मन का मारग मांहि घर, संगी सिरजनहार ॥१५॥*
टीका - हे जिज्ञासुओं ! परमेश्वर ने मनुष्य देह रूपी "पैंडा" कहिए, रास्ता अपनी प्राप्ति का जीवों को बताया है । इसलिये अब तुम अपनी सुरति को निद्र्वन्द्व कहिए, राग द्वेष आदि द्वन्द्वों से मुक्त करके परमेश्वर के नाम - स्मरण में लय लगाइये और बाकी बहिरंग सभी साधनों में क्लेश है । इसलिए लय रूप प्रेमाभक्ति ही क्लेशों से रहित सर्वश्रेष्ठ साधन है । इसी से परमात्मा के स्वरूप में स्थिर होइये, क्योंकि वह परमेश्वर ही तुम्हारा संगी है, जो जीवात्मा के पास ही निवास करता है ॥१५॥
(क्रमशः)

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