*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"*
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज
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*= लै का अंग ७ =*
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*लय*
*राम कहै जिस ज्ञान सौं, अमृत रस पीवै ।*
*दादू दूजा छाड़ि सब, लै लागी जीवै ॥१६॥*
टीका - हे जिज्ञासुओं ! सर्व ज्ञानों में वही शिरोमणी ज्ञान है, जिसके द्वारा संतजन राम - नाम का स्मरण करके भक्ति का अमृतरूपी रस - पान करते हैं । इसलिए अन्य सब साधनों को त्याग कर स्वस्वरूप ब्रह्म में अखंड लय लगा कर जीविये अर्थात् जीवन भर यह लय वृत्ति स्वरूप से कभी न हटाइये ॥१६॥
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*राम रसायन पीवतां, जीव ब्रह्म ह्वै जाइ ।*
*दादू आत्म राम सौं, सदा रहै ल्यौ लाइ ॥१७॥*
टीका - हे जिज्ञासुओं ! राम की भक्ति का अमृतरूपी रस पीता हुआ यह जीव ब्रह्मभाव को प्राप्त हो जाता है । इसलिए अब सदैव आत्मा रूपी राम में लय भक्ति के द्वारा स्थिर रहो ॥१७॥
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*रस रंग*
*सुरति समाइ सन्मुख रहै, जुग जुग जन पूरा ।*
*दादू प्यासा प्रेम का, रस पीवै सूरा ॥१८॥*
टीका - हे जिज्ञासुओं ! उसी पुरुष का मनुष्य - जन्म सफल है, जो युग - युगान्तर पर्यन्त एकाग्र वृत्ति द्वारा ब्रह्म - स्वरूप में लीन होकर, उसी के सम्मुख रहकर, उसी में अभेद होता है । इस प्रकार परमेश्वर के प्रेम का प्यासा, जो विरहीजन भक्ति अमृत का पान करता है, वही शूरवीर है ॥१८॥
(क्रमशः)

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