शनिवार, 19 जनवरी 2013

= लै का अंग =(७/१९-२१)

॥दादूराम सत्यराम॥
*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"* 
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी 
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज 
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*अध्यात्म*
*दादू जहाँ जगद्गुरु रहत है, तहाँ जे सुरति समाइ ।*
*तो इन ही नैनहुँ उलट कर, कौतुक देखै आइ ॥१९॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! अपने हृदय - कमल में ही परमेश्वर व्यापक है, वहाँ यत्नपूर्वक अपनी वृत्ति को स्थिर करो । इन बाह्य नेत्रों को पलट कर और आत्मा के सन्मुख होकर परमात्मा के आश्चर्य स्वरूप को अनुभव करिये ॥१९॥ 
रज्जब लै में लाभ है, लीन हुये रहु मांहि । 
लै में लत लागै नहीं, आन कथा मिट जांहि ॥ 
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*अख्यूं पसण के पिरी, भिरे उलथौं मंझ ।*
*जिते बैठो मां पिरी, निहारी दो हंझ ॥२०॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! अपने नेत्रों को प्यारे परमेश्वर के दर्शनों के लिए बाह्य विषयों से अन्तर्मुख करिये । हृदय में जहाँ हमारा प्यारा परमेश्वर बैठा है, वहाँ लय लगाकर अपने आत्मा का साक्षात्कार करो ॥२०॥ 
(शब्दार्थ - भिरे = बाह्य विषयों से । मंझ = अन्दर(हृदय में) । उलथौं = बदल कर, उलट कर । माम् = हमारा । हंझ = हे हंस मूर्ति ।)
छन्द - ज्ञान नैन देखिले, उधार चक्षु चित्त को । 
बिनहिं खेद पाइये, सुजान सुद्ध भिंत्त को ॥ 
अपार है अधार है जु, सार लै विचार को । 
सँभार ले सदा सही सु, धार ले सुचार को ॥ 
लै लाग्यो लहिये अलह, लै में लूट अपार । 
रज्जब लै लहिये लुक्यो, उर अन्य न अपार ॥ 
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*दादू उलट अनूठा आप में, अंतर सोध सुजाण ।*
*सो ढिग तेरे बावरे, तज बाहर की बाण ॥२१॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! अपनी मानसिक वृत्तियों को बाहर के विषयों से बदल कर अपने आत्मस्वरूप में स्थिर करो । हे बावले ! वह ब्रह्मतत्व, जिसके लिए तू बाहर भटकता है, वह तो तेरे समीप ही है । किन्तु बाहरी विषयों की बाण(आदत) को तज करके अन्तर में ढूंढेगा, तो स्वस्वरूप आत्मा का तू साक्षात्कार करेगा ॥२१॥ 
देह मध्ये स्थितं कथं मूढ ! न पश्यसि ? 
वाचाजल्पो वृथाSयं तु नि:शब्दं ब्रह्म उच्यते ॥ 
तेरा तेरे पास है, जहाँ उठत है श्वास । 
तहाँ तू गोता मार ले, सांई तेरे पास ॥ 
(क्रमशः)

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