*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"*
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज
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*= लै का अंग ७ =*
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*अध्यात्म*
*दादू जहाँ जगद्गुरु रहत है, तहाँ जे सुरति समाइ ।*
*तो इन ही नैनहुँ उलट कर, कौतुक देखै आइ ॥१९॥*
टीका - हे जिज्ञासुओं ! अपने हृदय - कमल में ही परमेश्वर व्यापक है, वहाँ यत्नपूर्वक अपनी वृत्ति को स्थिर करो । इन बाह्य नेत्रों को पलट कर और आत्मा के सन्मुख होकर परमात्मा के आश्चर्य स्वरूप को अनुभव करिये ॥१९॥
रज्जब लै में लाभ है, लीन हुये रहु मांहि ।
लै में लत लागै नहीं, आन कथा मिट जांहि ॥
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*अख्यूं पसण के पिरी, भिरे उलथौं मंझ ।*
*जिते बैठो मां पिरी, निहारी दो हंझ ॥२०॥*
टीका - हे जिज्ञासुओं ! अपने नेत्रों को प्यारे परमेश्वर के दर्शनों के लिए बाह्य विषयों से अन्तर्मुख करिये । हृदय में जहाँ हमारा प्यारा परमेश्वर बैठा है, वहाँ लय लगाकर अपने आत्मा का साक्षात्कार करो ॥२०॥
(शब्दार्थ - भिरे = बाह्य विषयों से । मंझ = अन्दर(हृदय में) । उलथौं = बदल कर, उलट कर । माम् = हमारा । हंझ = हे हंस मूर्ति ।)
छन्द - ज्ञान नैन देखिले, उधार चक्षु चित्त को ।
बिनहिं खेद पाइये, सुजान सुद्ध भिंत्त को ॥
अपार है अधार है जु, सार लै विचार को ।
सँभार ले सदा सही सु, धार ले सुचार को ॥
लै लाग्यो लहिये अलह, लै में लूट अपार ।
रज्जब लै लहिये लुक्यो, उर अन्य न अपार ॥
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*दादू उलट अनूठा आप में, अंतर सोध सुजाण ।*
*सो ढिग तेरे बावरे, तज बाहर की बाण ॥२१॥*
टीका - हे जिज्ञासुओं ! अपनी मानसिक वृत्तियों को बाहर के विषयों से बदल कर अपने आत्मस्वरूप में स्थिर करो । हे बावले ! वह ब्रह्मतत्व, जिसके लिए तू बाहर भटकता है, वह तो तेरे समीप ही है । किन्तु बाहरी विषयों की बाण(आदत) को तज करके अन्तर में ढूंढेगा, तो स्वस्वरूप आत्मा का तू साक्षात्कार करेगा ॥२१॥
देह मध्ये स्थितं कथं मूढ ! न पश्यसि ?
वाचाजल्पो वृथाSयं तु नि:शब्दं ब्रह्म उच्यते ॥
तेरा तेरे पास है, जहाँ उठत है श्वास ।
तहाँ तू गोता मार ले, सांई तेरे पास ॥
(क्रमशः)

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