बुधवार, 23 जनवरी 2013

= निष्कर्म पतिव्रता का अंग =(८/१-३)

॥दादूराम सत्यराम॥

*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"* 
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी 
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज 
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*= निष्कर्म पतिव्रता का अंग ८ =*
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अब "लै" के बाद में "निष्कर्म दादू दीन." इस सूत्र के व्याख्यान स्वरूप "निष्कर्म पतिव्रता' के अंग का निरूपण करते हैं । निष्कर्म, कहिए सकल सुख, दुःख आदि और गुण-विकारों से रहित पति परमेश्वर हेतु पतिव्रत रखना अथवा जो पुरुष निष्कर्म, निद्र्वन्द्व, निष्काम भाव होकर प्रभु का पतिव्रत रखते हैं, उनका नाम ही पतिव्रता जानिये । प्रस्तुत प्रकरण में परमेश्वर का निष्कर्म स्वरूप और निष्कर्म पतिव्रता के प्रभु पतिव्रत के अंग स्वरूप लक्षण कहेंगे ।
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*मंगलाचरण*
दादू नमो नमो निरंजनं, नमस्कार गुरुदेवतः ।
वन्दनं सर्व साधवा, प्रणामं पारंगत: ॥१॥ 
टीका - हे हमारे निष्कर्म पति स्वामी निरंजन देव ! आपको हम बारम्बार नमो नमो करते हैं और निष्कर्म पतिव्रत - धर्म का उपदेश करने वाले गुरुदेव को भी हम नमस्कार करते हैं और जिन साधुओं ने परमेश्वर का निष्काम पतिव्रत - धर्म धारण किया है, उन सब संतों को भी हम वंदना करते हैं । इस प्रकार हरि, गुरु, संतों को नमस्कार, वन्दना, प्रणाम करके निष्कर्म निरंजनदेव का पतिव्रत - धर्म धारण कर "पारंगतः" इस संसार से पार होकर निरंजन को प्राप्त होते हैं ॥१॥ 
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एक तुम्हारे आसरे, दादू इहि विश्वास ।
राम भरोसा तोर है, नहिं करणी की आस ॥२॥ 
टीका - हे हमारे प्रभु ! हे नाथ ! हे हमारे स्वामी ! हमको तो एक आपकी ही भक्त वत्सलता और दयालुता का आधार है । आपके विश्वास पर ही तो हमारे इस शरीर में श्वास अटक रहे हैं अर्थात् इस नर - तन की सफलता का हमें तो आप एक परमेश्वर के दर्शनों का ही विश्वास है । हे नाथ ! दान, तीर्थ, व्रत आदि करणी का हमें कोई भी विश्वास नहीं है बल्कि आपकी दया-सिन्धुता का ही एक मात्र भरोसा है । अभिप्राय यह है कि परमेश्वर के अपार अनन्त स्वरूप को जानने की साधनाएँ इस जीवात्मा से जन्म - जन्मान्तरों में भी सम्भव नहीं हैं । इसी से हम अपनी करणी का क्या विश्वास करें, क्योंकि जब तक अपनी करणी का विश्वास है, तब तक जीवात्मा में अहंत्व भाव बना रहता हैऔर जब तक जिज्ञासु में अहंत्व भाव है, तब तक जीवन की सफलता नहीं है । इसलिए अब साखी के अन्तिम चरण से श्री सतगुरु भगवान् के जिज्ञासुजनों को निष्कर्म भाव का उपदेश किया है ॥२॥ 
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रहणी राजस ऊपजै, करणी आपा होइ ।
सबथैं दादू निर्मला, सुमिरण लागा सोइ ॥३॥ 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! "रहणी", कहिए शील(ब्रह्मचर्य) व्रतादिक की धारणा से तो रजोगुण उत्पन्न होता है और "करणी", कहिए यज्ञ तप आदि के करने से अहंकार उत्पन्न होता है । इसलिये अब जो पुरुष निष्काम भावसे राम - नाम के स्मरण में लीन रहते हैं, वही सबसे श्रेष्ठ हैं ॥३॥ 
करणी रूप धरणी में, प्रबल मोह नरेश ।
"जगन" जगत पति नांव बिन, वृथा करै कलेश ॥
(क्रमशः)

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