॥दादूराम सत्यराम॥
*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"*
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज
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*= जरणा का अंग - ५ =*
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*जरणा जोगी जग रहै, झरणा परलै होइ ।*
*दादू जोगी गुरुमुखी, सहज समाना सोइ ॥१९॥*
टीका - हे जिज्ञासुओं ! जरणा करने वाला पुरुष, अज्ञान और जगत के जन्म - मरण आदिक से रहित होता है और "झरणा" = बहा देने वाला पुरुष उत्पत्ति और नाश को प्राप्त होता है । तथा गुरुमुखी जरणा करने वाला योगी तो नाना प्रकार के गुण - विकारों से मुक्त होकर स्वभाव से ही आत्म - स्वरूप में वृत्ति को समाकर मुक्त हो जाता है ॥१९॥
"काम क्रोध मद मोह जल, बूडत जीव अकाज । जन रज्जब जीव उद्धरै, जरणा बैठि जहज ।"
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*जरणा जोगी थिर रहै, झरणा घट फूटै ।*
*दादू जोगी गुरुमुखी, काल थैं छूटै ॥२०॥*
टीका - हे जिज्ञासुओं ! "जरणा" = पचाने वाला गुरुमुखी योगी तो अमर होता है और जो गुरु के उपदेश को "झरणा" = नहीं पचा पाता, वह पुरुष "प्रलय" कहिए नाश को प्राप्त होता है, ऐसा पुरुष भगवान् से विमुख रहकर जन्म - जन्मान्तरों में भटकता रहता है । परन्तु जो गुरुमुखी है, वह अशुभ वासना रूप काल से मुक्त रहता है ॥२०॥
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*जरणा जोगी जगपती, अविनाशी अवधूत ।*
*दादू जोगी गुरुमुखी, निरंजन का पूत ॥२१॥*
टीका - हे जिज्ञासुओं ! जरणा करने वाला भक्त सम्पूर्ण जगत में उत्तम है और वही पाप कर्मों से छुटकारा पाकर निर्मल = निष्पाप होकर जरा मरण भाव से रहित होता है । ऐसा गुरुमुखी योगी "निरंजन का पूत" कहिए, निरंजन को अत्यन्त प्रिय है ॥२१॥
(क्रमशः)

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