मंगलवार, 8 जनवरी 2013

= जरणा का अंग =(५/२२-२४)

॥दादूराम सत्यराम॥

*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"* 
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी 
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज 
*= जरणा का अंग - ५ =*
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*जरै सु नाथ निरंजन बाबा, जरै सु अलख अभेव ।*
*जरै सु जोगी सब की जीवन, जरै सु जग में देव ॥२२॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! जगत में जो अलख, अभेव, निरंजन, निराकार, ब्रह्मतत्व है, उसको अपना आत्मस्वरूप करके जानो । ऐसे स्मरण करते हुए उसको पचाओ । इस प्रकार की जरणा समस्त भक्तों के जीवन का आधार है । ऐसी जरणा करने वाला भगवद् भक्त जगत में ब्रह्मरूप होता है, क्योंकि परमेश्वर सम्पूर्ण सृष्टि के जीवों के गुण - विकारों को जानते हैं, फिर भी उनको पचा लेते हैं ॥२२॥
*जरै सु आप उपावनहारा, जरै सु जगपति सांईं ।*
*जरै सु अलख अनूप है, जरै सु मरणा नांहीं ॥२३॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! जो भक्त सम्पूर्ण सृष्टि की उत्पत्ति, पालन, संहार करने वाले परमेश्वर का स्मरण द्वारा साक्षात्कार करके उस परमानन्द को पचाता है, वह भक्त स्वयं अपने आपको भी जगत्पति में अभेद करके जन्म - मरण रहित मोक्ष पद को प्राप्त हो जाता है ॥२३॥ 
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*जरै सु अविचल राम है, जरै सु अमर अलेख ।*
*जरै सु अविगत आप है, जरै सु जग में एक ॥२४॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! जो पुरुष, परमेश्वर को अपनी आत्मा में ही प्रत्यक्ष करता है और अपने को परमेश्वर में अभेद करके निश्चय किया है, वह मुक्तपुरुष, परमात्मा के अविचल, अमर, अक्षय, अभय, अलख और अविगत पद को प्राप्त होता है ॥२४॥ 
(क्रमशः)

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