सोमवार, 7 जनवरी 2013

= जरणा का अंग =(५/१६-१८)

॥दादूराम सत्यराम॥
*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"* 
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी 
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज 
*= जरणा का अंग - ५ =*
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*अजर जरै रस ना झरै, जेता सब पीवै ।*
*दादू सेवक सो भला, राखै रस जीवै ॥१६॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! पूर्ण ब्रह्मभाव को प्राप्त होकर अजर जो ब्रह्मरस है, उसको पचावे, प्रकट नहीं करे । इस प्रकार ब्रह्मानन्द में अखण्ड वृत्ति लगाकर जो सेवक जीवन - मुक्त हैं, उनको धन्य है ॥१६॥ 
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*अजर जरै रस ना झरै, पीवत थाकै नांहि ।*
*दादू सेवक सो भला, भर राखै घट मांहि ॥१७॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! वही सेवक धन्य है, जो अजर अमर ब्रह्मरस को पीता हुआ कभी भी तृप्त नहीं होता है । अतृप्तभाव से अखण्ड वृत्ति द्वारा ब्रह्मानन्द रूप रस का पान करे और किन्हीं बहिरंग पुरुषों को कहकर न बतावे, ऐसा संत ब्रह्मरस को पचाकर स्वस्वरूप में मग्न रहता है ॥१७॥ 
"सांस - सांस सोई भजै, बिसरै कबहुँ न ताहि । 
जगन्नाथ ज्यूँ कुलवधू, सेवा करै लजाइ ॥"
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*साधु महिमा*
*जरणा जोगी जुग जुग जीवै, झरणा मर मर जाइ ।*
*दादू जोगी गुरुमुखी, सहजैं रहै समाइ ॥१८॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! सतगुरु की शिक्षा को मानकर उसको जो पचाता है अर्थात् गुप्त रखता है, वह शिष्य सम्पूर्ण इन्द्रियों के गुण विकार आदि की वृत्तियों को रोक कर फिर अपने सहज निद्र्वन्द्व स्वरूप ब्रह्मानन्द में मग्न रहता है और अमर भाव को प्राप्त होता है । इसके विपरीत, जो पुरुष सतगुरुओं की आज्ञा को उल्लंघन करके पंच विषयों में प्रवृत्त होता है तथा ब्रह्माकार वृत्ति को दुनियावी चमत्कार आदिक में लगाता है, वह पुरुष जन्म - जन्मान्तरों में जन्म - मृत्यु को प्राप्त होता रहता है ॥१८॥ 
"पुनरपि जननं पुनरपि मरणं, 
पुनरपि जननी - जठरे शयनम् ।" 
(क्रमशः)

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