रविवार, 27 जनवरी 2013

= निष्कर्म पतिव्रता का अंग =(८/२६-८)

॥दादूराम सत्यराम॥

*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"* 
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी 
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज 
.
*= निष्कर्म पतिव्रता का अंग ८ =*
.
*साहिब रहतां सब रह्या, साहिब जातां जाइ ।*
*दादू साहिब राखिये, दूजा सहज स्वभाइ ॥२६॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! राम के पतिव्रत धर्म के रहते हुए सभी कुछ जप, तप, तीर्थ, व्रत, दान, पुण्य, सार्थक हो जाते हैं । और कदाचित् मानव परमेश्वर से विमुख रहे तो, उसके सम्पूर्ण शुभकर्म और मनुष्य जन्म की(देही) सौंज व्यर्थ ही नाश हो जाती है । इसलिये साधनों द्वारा एक राम का ही पतिव्रत - धर्म धारण करिये, बाकी भक्ति आदि तो स्वभाव से ही प्राप्त हो जाती है । इसलिए निष्कामभाव से ही राम का पतिव्रत - धर्म धारण करिये ॥२६॥ 
.
*मन चित मनसा पलक में, सांई दूर न होइ ।*
*निष्कामी निरखै सदा, दादू जीवन सोइ ॥२७॥* 
टीका - हे जिज्ञासुजन ! अपने मन, चित्त - वृत्ति, मनसा द्वारा एक क्षण भी परमेश्वर के स्मरण से अलग नहीं रहते हैं । ऐसे साधक निष्काम भाव से प्रभु में लय लगाकर परमेश्वर का साक्षात्कार करते हैं और उन्हीं भक्तों का जन्म सार्थक होता है ॥२७॥ 
पयोद ! वारि ददासि वा न त्वदेकचित्त: पुनरेष चातक: ।
.
*कथनी बिना करणी*
*जहाँ नाम तहँ नीति चाहिये, सदा राम का राज ।*
*निर्विकार तन मन भया, दादू सीझै काज ॥२८॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! राम के भक्तों को सदैव राम की आज्ञानुसार ही व्यवहार करना चाहिए, उनके हृदय में ही राम - राज्य रहता है । इस प्रकार जिन जिज्ञासुओं के तन - मन - इन्दियाँ निर्विकार, निश्चल होकर परमेश्वर में स्थिर रहते हैं । उनके सम्पूर्ण मानव - जन्म के कार्य सिद्ध हो जाते हैं ॥२८॥
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें