॥दादूराम सत्यराम॥
*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"*
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज
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*= परिचय का अंग - ४ =*
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*दादू गांझी ज्ञान है, भंजन है सब लोक ।*
*राम दूध सब भरि रह्या, अैसा अमृत पोष ॥३५१॥*
टीका - हे जिज्ञासुओं ! सतगुरु का ज्ञानरूप उपदेश तो भेड़ है और चौदह लोक ही(भाजन) बर्तन हैं । निष्काम भक्ति और आत्मज्ञान ही उस भेड़ का दूध है । उस भेड़ के अमृत तुल्य दूध से सम्पूर्ण शरीरों का पोषण होता है ॥३५१॥
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*दादू झूठा जीव है, गढिया गोविन्द बैन ।*
*मनसा मूंगी पंखि सौं, सूरज सरीखे नैन ॥३५२॥*
टीका - हे जिज्ञासुओं ! इस जीव ने गर्भवास में परमेश्वर से कोल करार किया था, कि मैं आपका भजन करूँगा, लेकिन उस कौल को बाहर आकर भूल गया,अतः यह जीव झूठा है । यह मानवरूपी चींटी है, जिसके सत्य निश्चय रूपी पंख हैं और सूरज सरीखे कहिए, जिसके आत्म - ज्ञानरूप नेत्र हैं, उनसे ब्रह्म में प्रवेश करिये ॥३५२॥
नामदेव जी महाराज का पद ~
= शब्द =
लटके न बोलूं बाप, व्रत मान गाढो ।
कोल्हा येवड़ा मोतीड़ा, मैं मंझे डोले पेखीला ॥टेक॥
छेली बैली बाघ जैइला, मांझरिया भय टूंडै ।
उड़त पंखि मैं लवरू देख्या, नरली जे ह्वै टांडै ॥
बावलिया चै षोटै, माखनियां चै पोटै ।
संखा सुनहाँ मारीला, तहं मींडक अभिला लोटै ॥
अम्हे जु गैला ब्राट देश, तहं गांझी दूध केला ।
स्त्रव आटै गांझीला तहं, चौदह रंजन भरिला ॥
लटक्यौं गइयौ गढिया जोलै, गढिया येवड़ै रोले ।
उड़त पंखि मैं मूंगी पेखी, वाटी जे है डोले ॥
विष्णुदास नामदेव इमैं प्रणवै, ये छैं जीव ची उक्ती ।
लटके आछै सांगीला, ताछै मोक्ष न मुक्ती ॥
दक्षिण भारत पंढरपुर में नामदेव जी महाराज ने विद्वानों की सभा में अपने अनुभव का एक शब्द बोला । वह शब्द सुनकर विद्वान् बोले - महाराज ! आपने भक्त होकर अच्छी झूठ बोली । नामदेव जी बोले - अनुभव का अर्थ, अनुभव वाले महात्मा ही बता सकते हैं । इसलिए यह पद आप, ब्रह्मऋषि दादू दयाल जी महाराज जो आमेर में हैं, उनके पास ले जाओ । वे आपको इसका अर्थ बतावेंगे । तब पंढरपुर से चार ब्राह्मण आमेर आए और गुरुदेव जी को अनुभव का पद सुनाया । उसके उत्तर में ३४६ से ३५२ तक की साखियों से ब्रह्मऋषि ने उत्तर दिया है ।
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*सांई दीया दत घणां, तिसका वार न पार ।*
*दादू पाया राम धन, भाव भक्ति दीदार ॥३५३॥*
॥इति परिचय का अंग सम्पूर्णः ॥अंग४॥साखी ३५३॥
टीका - हे जिज्ञासुओं ! जिनको परमेश्वर और सतगुरु ने प्रसन्न होकर परिचयरूपी कहिए, परमेश्वर का स्वस्वरूप रूपी द्रव्य दिया, उस धन का न आदि है और न अन्त ही है । इस रीति से हरि और ब्रह्मनिष्ठ गुरु की कृपा से आत्म निश्चय प्राप्त हुआ । तब शील, संतोष, सत्य, दया, धर्म, स्नेह आदि द्रव्य बहुत प्राप्त हुआ और फिर रामधन को हृदय में संचित करके कृतकृत्य हो गए हैं ।
॥इति परिचय का अंग टीका और दृष्टान्तों सहित सम्पूर्णः ॥अंग ४॥साखी ३५३॥
(क्रमशः)

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