शनिवार, 26 जनवरी 2013

= निष्कर्म पतिव्रता का अंग =(८/१९-२२)

॥दादूराम सत्यराम॥
*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"* 
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी 
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज 
.
*= निष्कर्म पतिव्रता का अंग ८ =*
.
*सब सुख मेरे साँइयाँ, मँगल अति आनन्द ।* 
*दादू सज्जन सब मिले, जब भेंटे परमानन्द ॥१९॥* 
भगवान् ही मेरे सँपूर्ण साँसारिक सुख हैं । मँगलमय भगवान् ही मेरे उत्तम लोकों का अति आनन्द हैं । जब परमानन्द रूप ब्रह्म से मिलन होता है तब सभी दैवी गुण रूप सज्जनों का मिलन भी आप ही हो जाता है ॥१९॥
.
*दादू रीझै राम पर, अनत न रीझै मन ।*
*मीठा भावै एक रस, दादू सोई जन ॥२०॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! हमारा मन राम के अद्भुत स्वरूप दर्शनों में ही मग्न रहता है और निःसार मायिक पदार्थों में अब प्रवृत्त नहीं होता है । हे संतों ! जिनको परमेश्वर ही मीठा(सुखरूप) लगता है और जो भक्त एकरस होकर भगवान् में ही मग्न रहते हैं, वे ही परमेश्वर के भक्त धन्य हैं ॥२०॥ 
गुरु दादू आमेर में, तहाँ गये बाजिन्द । 
फूल सराह्यो देख करि, ये सब माया निंद ॥ 
प्रसंग - ब्रह्मऋषि दादू दयाल जी महाराज आमेर में निवास करते थे । किसी भक्त ने एक गुलाब का फूल लाकर महाराज को भेंट किया । इतने में ही बाजींद जी आए और महाराज को प्रणाम किया । फूल को देखकर बोले - गुरुदेव ! यह बड़ा सुन्दर फूल है । गुरुदेव बोले - बाजींद जी, संतों का मन तो राम के स्वरूप पर रीझता है, मायिक पदार्थों पर नहीं रीझता । इसकी क्या सराहना करते हो ? बाजींद जी गुरुदेव के चरणों में नतमस्तक हो गए ।
.
*दादू मेरे हृदय हरि बसै, दूजा नांही और ।*
*कहो कहाँ धौं राखिये, नहीं आन को ठौर ॥२१॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! हमारे अन्तःकरण में तो एक प्रभु का ही निवास है । ऐसी अवस्था में अब द्वैतभाव नहीं प्रतीत होता है । माया और माया के प्रपंच की एक श्वास भी स्फुरणा नहीं फुरती है । हे संतों ! इस "धौं" कहिए, इस लय को और कहाँ लगाइये ? क्योंकि भगवान् का पतिव्रत - धर्म धारण करने पर माया प्रपंच और अहंभाव को कहीं भी स्थान नहीं है ॥२१॥ 
छन्द - 
होइ अनन्य भजै भगवंत ही, 
और कछू उर में नहीं राखै । 
देवि रु देव जहाँ लग हैं, 
डरके तिनसूं कहि दीन न भाखै ।
योग हु यज्ञ व्रतादि क्रिया, 
तिनकूं तो नहीं स्वपने अभिलाखै । 
सुन्दर अमृत पान कियो तब, 
तो कहु कौन हलाहल चाखै ॥ 
जगन्नाथ मन एक हो, सो ले दियो मुरारि । 
और ठौर कहाँ लाइये, मन न भये द्वै च्यारि ॥ 
बसरै बीबी राबिया, मुहम्मद कही जमाइ । 
मेरे हिरदै आप हैं दूजा कहाँ समाई ॥ 
चित्त जु लागा मित्त सूं, मित्त समाना चित्त । 
एकहि एक समाइया, दूजे ठाहर कित्त ॥ 
दृष्टान्त - बसरा नगर में ईश्वर की परम भक्त बीबी राबिया रहती थी । एक समय मुहम्मद साहब ने उससे कहा - तुम हमको अपने हृदय में दोस्त के रूप में रखो । तब राबिया बाई बोली - मेरे दिल में परमात्मा के अलावा और किसी दूसरे के लिये कोई जगह नहीं बची है, अत: आपको कहाँ रखूँ ? और द्वैत तो दु:ख की जड़ है । सन्त एक प्रभु को छोड़कर अन्य किसी का ध्यान नहीं करते, इसीलिये वे सदा परमानन्द में खोये रहते हैं । यह उत्तर सुनकर मुहम्मद साहब गद्गद् हो गये । 
.
*दादू नारायण नैना बसै, मनही मोहन राइ ।*
*हिरदा मांही हरि बसै, आतम एक समाइ ॥२२॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! हमारे नेत्रों में केवल नारायण ही बसता है, अर्थात् हमारे नेत्र समस्त जगत - प्रपंच को नारायण स्वरूप करके ही देखते हैं और हमारा मन परमेश्वर चिंतन में लयलीन रहता है । एवं अन्तःकरण में एक हरि का ही निवास है और आत्मरूप से सब शरीरों में परमेश्वर ही समाये हुए हैं । पूर्वोक्त प्रकार से परमेश्वर का पतिव्रत - धर्म धारण करके मुक्तजन एक रस भगवान् में ही समाये हुए हैं ॥२२॥ 
तन पिव मन पिव नैन पिव, रुंधी सब ठांम । 
हौं तो नाहीं बलि गई, रोम रोम तव नाम ॥ 
पतिव्रता को पीव बिन, अन्य कछु नहीं भाइ । 
माता सीता का चरित, सम्यक यह दर्शाइ ॥ 
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें