शुक्रवार, 4 जनवरी 2013

= जरणा का अंग =(५/१-३)


॥दादूराम सत्यराम॥ 
*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"* 
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी 
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज 
*= जरणा का अंग - ५ =*
"दादू पाया रामधन भाव भक्ति दीदार.", इस सूत्र के व्याख्यान स्वरूप अब "जरणा के अंग" का निरूपण करते हैं । गुजराती भाषा के "जरनं" शब्द से जरणा बना है । इसका अर्थ पचाना, धारण करना, गुप्त रखना, हजम करना है । और जरणा के नाना स्वरूप हैं, जैसे विषयशक्ति, कटुक वचन आदिक की जरणा; निग्रह; क्षमा; शान्ति रखना; सतगुरु उपदेश की जरणा धारण करना; नाम स्मरण से उत्पन्न आत्म - ज्ञान या आत्मा का आनन्द, उसकी जरणा करना; सिद्धि आदिक चमत्कारों की जरणा; परमेश्वर दर्शन या साक्षात्कार; धर्मदान; शुभ कर्म; इत्यादि प्रकार से व्यवहार और परमार्थ के लीए नाना भेदों की "जरणा" का इस अंग में दृष्टान्त सहित प्रतिपादन करते हैं । 
*मंगलाचरण*
*दादू नमो नमो निरंजनं, नमस्कार गुरुदेवतः ।* 
*वंदनं सर्व साधवा, प्रणामं पारंगतः ॥१॥* 
टीका - सर्व - जरणा - स्वरूप निरंजनदेव को नमस्कार है । स्वयं सतगुरुओं ने परमेश्वर परिचय कराकर जरणा का उपदेश किया है, उनके कमलरूप चरणारविन्द में नमस्कार है । साधुजन, जिन्होंने अपने सत्संग में जिज्ञासुओं को रखकर जरणा करने वाले बनाये हैं, उनको बारंबार वन्दना है । इस प्रकार जरणावान् पुरुष संसार से पार हो जाते हैं ॥१॥
*जरणा का स्वरूप* 
*को साधु राखै रामधन, गुरु बाइक वचन विचार ।* 
*गहिला दादू क्यों रहै, मरकत हाथ गँवार ॥२॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! हजारों में से कोई एक - आध साधक पुरुष गुरुवचन का विचार करके राम - नाम रूपी धन को हृदय में संचित करके गुप्त रखता है । बाकी तो सामान्य संसारी पामर विषयी व्यक्तियों के हृदयरूपीहाथ में यह रामधन नहीं रुकता है । जिस तरह व्यवहार में गँवार के हाथ में मरकत = मणि नहीं रहती है, ऐसे ही रामधनरूपी मणि, बहिर्मुखों के हृदय में नहीं ठहरती है ॥२॥ 
(पाठान्तर मरकत = मर्कट = वानर) 
"को साधु राखै राम धन" इस पर दृष्टात देते हैं - 
एक नृप चाकर खा गयो, टांग सुस्सा की एक ।
त्रास दई ससक्यो नहीं, साधु लई सु देख ॥ 
दृष्टान्त - एक राजा को खरगोश के मांस खाने का शौक था । एक नौकर की ड्यूटी राजा ने लगाई थी कि तुम रोज एक खरगोश जंगल से खोजकर लाया करो । एक रोज नौकर ने सोचा कि इसके मांस में क्या स्वाद है ? मैं भी आज इसकी एक टांग तोड़कर खाकर देखूं । फिर विचार किया कि राजा पूछेगा कि इसके तीन टाँग ही कैसे हैं ? मैं बोल दूँगा - "अन्नदाता ! यह तीन टांग का खरगोश है ।' तब वह एक टाँग तोड़कर खा गया और फिर खरगोश को राजा के पास ले गया । राजा ने पूछा - इसकी एक टाँग कहाँ गई ? "अन्नदाता ! यह तीन टाँग का ही है ।" राजा ने हाथ में हंटर लिया और उसके एक मारा । "मूर्ख ! खून गिर रहा है और कहता है, तीन ही टाँग का है ? बता, कहाँ गई एक टाँग ?" बोला - "अन्नदाता ! चाहे जान से मार दो, टाँग तो इसके तीन ही थी, यही बताऊँगा । " एक संत भी उधर आ निकले । उन्होंने यह कौतुक देखा और खड़े हो गए । फिर मन में विचार किया कि रामधन की, अपने धर्म पुण्य की, इसी प्रकार जरणा करनी चाहिए, जैसे इस नौकर ने सुस्से की टांग की जरणा कर ली । 
"गहिला...मरकत हाथ गँवार" इस पर दृष्टान्त कहते हैं - 
साधु वस्तु दई जाट को, हुक्का में कर प्यार । 
जरी नहीं बकने लग्यो, फौरन लई उतार ॥ 
दृष्टान्त - एक संत घूमते हुए एक जाट के घर आकर ठहरे । जाट सेवा करने लगा । संत ने विचार किया कि इसकी दिव्य दृष्टि बना दें । उन्होंने एक जड़ी का टुकड़ा चिलम में रखकर, अग्नि मंगवाकर बोले - "हुक्का पर रख ले । खेंच ।" खेंचने के साथ ही दिव्य चक्षु खुल गए । जाट के जरी नहीं । आकाश में देखा, बोला - "गुरु जी ! वह देवता विमान से जा रहा है, उस पापी को यमदूत ले जा रहे हैं", इस प्रकार बकने लगा । संत ने देखा, किस मूर्ख को जड़ी पिला दी । झट दूसरी मूर्ख जड़ी निकाली । संत ने कहा - "चिलम उलट" और कहा - "ये जड़ी रख कर अग्नि चिलम में रख । अब खेंच ।" ज्यों ही खेंची, खेंचते ही आगे - पीछे की जो कुछ दिखने लगी थी, वह सब बन्द हो गई और जाट पहले की तरह ही ठूँठ रह गया । 
*दादू मन ही मांहि समझ कर, मन ही मांहि समाइ ।*
*मन ही मांहि राखिये, बाहर कहि न जनाइ ॥३॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! अपने मन में ही राम - धन को स्मरण करके विचारपूर्वक परमेश्वर में लीन रहो । क्योंकि राम - धन ऐसा गुप्त धन है कि इसको मन में ही छिपा कर रखिये, किसी को कहकर नहीं बताना ॥३॥ 
(क्रमशः)

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