*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"*
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज
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*= जरणा का अंग - ५ =*
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*दादू जरै सु ज्योति स्वरूप है, जरै सु तेज अनन्त ।*
*जरै सु झिलमिल नूर है, जरै सु पुंज रहंत ॥२८॥*
टीका - हे जिज्ञासुओं ! जरणा करने वाला योगी, ज्योति स्वरूप अनन्त तेजोमय होकर प्रकाशता है और जड़, चेतन, सम्पूर्ण सृष्टि में ब्रह्म चैतन्य की झिलमिलाहट को ही देखता है । इस प्रकार जरणावान भक्त, भगवान् की ज्योति, तेज, नूर रूप होकर अनन्त अपार रूप से प्रकाशता है ॥२८॥
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*दादू जरै सु परम प्रकाश है, जरै सु परम उजास ।*
*जरै सु परम उदीत है, जरै सु परम विलास ॥२९॥*
टीका - हे जिज्ञासुओं ! जरणा करने वाला पुरुष सर्वश्रेष्ठ और स्वयं प्रकाशरूप है तथा सर्वत्र उजागर और स्वयं सिद्ध है । जरणा करने वाला श्रेष्ठ उत्साह स्वरूप है, उससे उत्तम और कोई नहीं है ॥२९॥
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*दादू जरै सु परम पगार है, जरै सु परम विगास ।*
*जरै सु परम प्रभास है, जरै सु परम निवास ॥३०॥*
टीका - हे जिज्ञासुओं ! जरणा करने वाला "पगार" कहिए प्रकाशमय और "विगास" नाम विकसित या प्रफुल्लित है । जरणावान योगी ब्रह्म स्वरूप होकर अधिष्ठान ब्रह्म में अभेद होता है और उपरोक्त सम्पूर्ण अंग का जरणा से गुण - विकार आदि को पचाने का निर्देश है ॥३०॥
(क्रमशः)
टीका - हे जिज्ञासुओं ! जरणा करने वाला योगी, ज्योति स्वरूप अनन्त तेजोमय होकर प्रकाशता है और जड़, चेतन, सम्पूर्ण सृष्टि में ब्रह्म चैतन्य की झिलमिलाहट को ही देखता है । इस प्रकार जरणावान भक्त, भगवान् की ज्योति, तेज, नूर रूप होकर अनन्त अपार रूप से प्रकाशता है ॥२८॥
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*दादू जरै सु परम प्रकाश है, जरै सु परम उजास ।*
*जरै सु परम उदीत है, जरै सु परम विलास ॥२९॥*
टीका - हे जिज्ञासुओं ! जरणा करने वाला पुरुष सर्वश्रेष्ठ और स्वयं प्रकाशरूप है तथा सर्वत्र उजागर और स्वयं सिद्ध है । जरणा करने वाला श्रेष्ठ उत्साह स्वरूप है, उससे उत्तम और कोई नहीं है ॥२९॥
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*दादू जरै सु परम पगार है, जरै सु परम विगास ।*
*जरै सु परम प्रभास है, जरै सु परम निवास ॥३०॥*
टीका - हे जिज्ञासुओं ! जरणा करने वाला "पगार" कहिए प्रकाशमय और "विगास" नाम विकसित या प्रफुल्लित है । जरणावान योगी ब्रह्म स्वरूप होकर अधिष्ठान ब्रह्म में अभेद होता है और उपरोक्त सम्पूर्ण अंग का जरणा से गुण - विकार आदि को पचाने का निर्देश है ॥३०॥
(क्रमशः)

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