मंगलवार, 8 जनवरी 2013

= जरणा का अंग =(५/२५-७)


॥दादूराम सत्यराम॥
*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"* 
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी 
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज 
*= जरणा का अंग - ५ =*
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*जरै सु अविगत आप है, जरै सु अपरम्पार ।*
*जरै सु अगम अगाध है, जरै सु सिरजनहार ॥२५॥*
टीका - हे जिज्ञासुओं ! सम्पूर्ण संसार के जीवों के अवगुणों को "जरै" कहिए, पचाता है और स्वस्वरूप ब्रह्म का आनन्द अनुभव करके उसे पचाता है, वही पुरुष ब्रह्मरूप है । उसकी महिमा अपार कहिए, बेहद है, तथा उसकी "जरै" कहिए धारणा भी अगम अगाध है ॥२५॥ 
सारग्राही एक नृप हो, औगुण लेतो नांहि । 
मरे श्वान को देखकर, दांत सराहे ताहि ॥ 
दृष्टान्त - एक राजा था । उसको एक संत ने उपदेश किया कि जीवों के अवगुण नहीं देखना, उनके गुण देखना । फिर राजा किसी को बुरा नहीं कहता और उनमें जो गुण होता, वह ले लेता । एक दिन मंत्री राजा की परीक्षा करने के लिए राजा को उस मार्ग से ले गया, जिधर एक मरा कुत्ता पड़ा था । मंत्री बोला - महाराज ! इस दुष्ट कुत्ते ने पहले के कुकर्मों से तो कुत्ते का शरीर पाया और अब इसमें कीड़े पड़ गए । अब यह सबको दुर्गन्धि द्वारा दुःख पहुँचाता है । राजा बोला - "मंत्री जी , देखो । इसके दाँत कितने छोटे - छोटे सुन्दर हैं ।" मंत्री ने राजा के चरण - स्पर्श किए और बोला - अन्नदाता ! आप किसी को भी खराब नहीं बतलाते हैं, उसमें कुछ न कुछ गुण ढूँढ लेते हो, इसका क्या कारण है ? राजा बोला - मंत्री जी, अवगुण तो सभी लेते हैं, परन्तु मनुष्य - जन्म पाकर गुण ग्रहण करे, उसी की बलिहारी है ।
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*जरै सु निज निराकार है, जरै सु निज निरधार ।*
*जरै सु निज निर्गुणमयी, जरै सु निज तत सार ॥२६॥*
टीका - हे जिज्ञासुओं ! निरंजन निराकार ब्रह्म के स्मरण करने वाले पुरुष निराकार स्वरूप होते हैं और अनात्म वासनाओं से मुक्त और गुणातीत होते हैं । उन्होंने "तत् त्वम्", शब्द के लक्ष्य तत्वार्थ को प्रत्यक्ष कर लिया है ॥२६॥ 
पादु ग्राम में पक्षपात की बात से, अन्त न विजय दिखात । 
अल्लहण ने पाडी दुही, लज्जित साध जमात ॥
दृष्टान्त - पादू गांव में ब्रह्मऋषि दादूदयाल महाराज के शिष्य अल्लहण जी भक्त निवास करते थे । वह तत्ववेत्ता ज्ञानी पुरुष थे । गृहस्थी के नाते सभी संतों की सेवा भी किया करते थे । एक रोज एक साधुओं की जमात आ गई । उनकी सेवा और सत्संग होने लगा । तब अल्लहण भक्त बोले - ब्रह्मऋषि गुरुदेव हमारे ब्रह्म सदृश हैं, क्योंकि ब्रह्म का स्वरूप जिन्होंने जान लिया, वे ब्रह्मरूप ही होते हैं । जमात के साधुओं ने कुछ खींचातानी की, अर्थात् पक्षपात की बात करने लगे । अल्लहण भक्त बोले कि यह पडिया है, या तो आप इसका दूध निकाल कर बताओ, या मैं आपको गुरुकृपा से दूध निकाल कर ऊँगा । साधु बोले - आप ऐसे गुरुमुखी भक्त हैं तो आप ही इसका दूध निकाल कर बताओ । तब अल्लहण भक्त ने सत्यराम कहकर पडिया पर हाथ रखा और पडिया को दुहने बैठ गए । लोटा दूध से भर गया । यह देखकर सम्पूर्ण साधु लज्जित हो गए और बोले - आप तो परमेश्वर का रूप ही हो, भक्तजी !
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*जरै सु पूरण ब्रह्म है, जरै सु पूरणहार ।*
*जरै सु पूरण परमगुरु, जरै सु प्राण हमार ॥२७॥*
टीका - हे जिज्ञासुओं ! परमेश्वर के स्वरूप की जरणा करने वाले ब्रह्मवेत्ताओं की अपार महिमा है, क्योंकि वह अपने लक्ष्य स्वरूप को प्राप्त करके अपूर्व राम - रस को पचाते हैं । इसलिए वह स्वयं भी परमात्मा रूप पूर्ण भाव को प्राप्त हो गए हैं । वे सबके प्राणाधार स्वरूप ही हैं ॥२७॥ 
(क्रमशः)

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