रविवार, 6 जनवरी 2013

= जरणा का अंग =(५/१३-५)

॥दादूराम सत्यराम॥

*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"* 
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी 
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज 
*= जरणा का अंग - ५ =*
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*सोई सेवक सब जरै, जेता घट परकास ।*
*दादू सेवक सब लखै, कहि न जनावै दास ॥१३॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! जिसके हृदय में पूर्ण ब्रह्म का प्रकाश है, वही सच्चा जरणा करने वाला सेवक है । ऐसा सेवक स्वस्वरूप साक्षात्कार करके भी किसी को कहकर अपनी कीर्ति नहीं करवाता । ऐसे पुरुष सर्व शुभ - अशुभ को जानते हुए भी मौन रहते हैं और किसी को वचन आदि देकर सिद्धि चमत्कार नहीं दिखाते । केवल प्रभु का ही पतिव्रत रखते हैं और परमेश्वर से अतिरिक्त किसी का यश कीर्ति क्यों कहें ? वह परमात्मा अन्तर्यामी है, घट - घट की स्वयं सब जानते हैं, अब उनसे क्या कहना है ?।१३॥ 
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*अजर जरै रस ना झरै, घट मांहि समावै ।*
*दादू सेवक सो भला, जे कहि न जनावै ॥१४॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! अजर कहिए ब्रह्मानन्द को जराव स्वरूप साक्षात्कार करें और ब्रह्मानन्द रूप रस को कह करके नहीं जनावें बहिर्मुखियों को । और काम - क्रोध आदि को नष्ट करके राम - रस को पीवें और ब्रह्माकार वृत्ति द्वारा स्वस्वरूप में ही स्थिर रहें । अपनी साधना को प्रकट नहीं कहें, ऐसे पुरुष उत्तम हैं ॥१४॥ 
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*अजर जरै रस ना झरै, घट अपना भर लेइ ।*
*दादू सेवक सो भला, जारै जाण न देइ ॥१५॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! अपने स्वरूपानन्द का प्रत्यक्ष अनुभव करके अजर ब्रह्मानन्द स्वरूप रस को पचावें और झरै कहिए कह कर न जनावें और अपने आपा अहंकार को विरह रूप अग्नि में जलाकर क्षार कर दें तब वहाँ स्वयं परमात्मा प्रकट होता है । ऐसे सेवकों को धन्य है ॥१५॥ 
"रस भुगतै ज्यूं रस रहै, अनरस कबहुँ न होइ । 
जगन्नाथ जारै जपै, रस के रसिया सोइ ।" 
(क्रमशः)

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