*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"*
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज
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*= निष्कर्म पतिव्रता का अंग ८ =*
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*तूं सत्य तूं अविगत तूं अपरंपार, तूं निराकार तुम्हचा नाम ।*
*दादू चा विश्राम, देहु देहु अवलम्बन राम ॥१३॥*
टीका - हे गोविन्द ! आप सत्य हो । आप अविगत्य हो । आप अपरंपार हो । आप निराकार स्वरूप हो । हमारे तो आपका ही नाम है । हे गोविन्द ! हम तो आप में ही विश्राम चाहते हैं । हे गोविन्द ! आप के नाम का और स्वरूप का हमको अवलम्बन देओ ॥१३॥
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*दादू राम कहूँ ते जोड़बा, राम कहूँ ते साखि ।*
*राम कहूँ ते गाइबा, राम कहूँ ते राखि ॥१४॥*
टीका - हे जिज्ञासुओं ! अपने मन को स्वस्वरूप राम में लगाना ही हमारे अक्षरों का जोड़ना है और राम का कहना ही अर्थात् स्मरण करना ही साखी कहना है अर्थात् साक्षी बनाना है और हे साक्षीस्वरूप राम ! आपका नाम - स्मरण ही हमारे कंठ से गायन करना है । राम का कहना ही हमारे लिए आप द्वारा रक्षा करना है अथवा दैवी सम्पदा के गुणों का रखना है ॥१४॥
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*दादू कुल हमारे केशवा, सगा तो सिरजनहार ।*
*जाति हमारी जगद्गुरू, परमेश्वर परिवार ॥१५॥*
टीका - हे जिज्ञासुओं ! जैसे व्यवहार में संसारीजनों को कुल का, सगा सम्बन्धियों का, जाति परिवार आदि का अवलंबन रहता है, वैसे ही भक्तजनों को सम्पूर्ण आधार एक परमेश्वर का ही है अर्थात् ब्रह्मऋषि कहते हैं कि हमारा कुल - कुटुम्ब भगवान् केशव ही है और सिरजनहार ही हमारा सगा सम्बन्धी है । जगद्गुरु(गर्भावस्था में सबको उपदेश करने वाला) परमात्मा ही हमारी जाति है और परम ऐश्वर्ययुक्त ईश्वर ही हमारा सम्पूर्ण परिवार है ॥१५॥
(क्रमशः)

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