॥दादूराम सत्यराम॥
*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"*
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज
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*= मन का अंग १० =*
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*विरक्तता*
*सीप सुधा रस ले रहै, पीवै न खारा नीर ।*
*मांहैं मोती नीपजै, दादू बंद शरीर ॥५५॥*
टीका - हे जिज्ञासुओं ! जैसे खारे समुद्र में मोती पैदा करने वाली सीपी रहती है । वह स्वाति नक्षत्र की बूंद की प्यासी है । जब स्वाति नक्षत्र में मेह बरसता है, तब वह समुद्र जल में ऊपर आकर अपनी चारों पंखुड़ी खोल कर स्वाति नक्षत्र की बूंदें ग्रहण करती है । फिर अपने मुँह को बन्द कर लेती है, खारा पानी नहीं पीती और समुद्र में ही रहती है, जिससे उसमें मोती पैदा होते हैं ॥५५॥
दार्ष्टान्त में, उत्तम साधक सीपि के स्थान में है । समुद्र के स्थान में संसार - समुद्र है, खारा पानी के स्थान में संसार के विषय - भोग हैं और मायावी वासना है । जब स्वाति नक्षत्र रूप ब्रह्मनिष्ठ गुरूदेव प्राप्त होवे और उनके मुखारविन्द से जीव ब्रह्म की एकता का उपदेश रूपी अमृत बरसने लगे, तो उत्तम जिज्ञासु ही सीपि की तरह उस अमृत को कानों के द्वारा अन्तःकरण में ग्रहण करता रहता है । जब वह स्वाति नक्षत्र बरस चुकता है, वैसे ही उन गुरुदेव का जब सत्संग समाप्त हो जाता है, तब वह उत्तम जिज्ञासु चतुष्टय अन्तःकरण को अन्तर्मुख करके गृहस्थ आश्रम रूपी खार समुद्र में ही निवास करते हुए भी उस जल से स्नेह नहीं करता, अनासक्त रहता है । उसके फलस्वरूप ब्रह्म - साक्षात्कार रूप मोती उत्पन्न होते हैं ।
देही अरु दरियाव का, पाणी पीवै नांहि ।
तो मन मोती नीपजै, सुरति सीप कै मांहि ॥
अहि मुख पर्यो सो विष भयो, कदली भयो कपूर ।
सीप पर्यो मोती भयो, संगत के फल ‘सूर’ ॥
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*मन*
*दादू मन पंगुल भया, सब गुण गये बिलाइ ।*
*है काया नौ - जोबनी, मन बूढ़ा ह्वै जाइ ॥५६॥*
टीका - हे जिज्ञासुओं ! मुक्त - पुरुषों का मन, बहिरंग वासनाओं से और गुण क्रिया आदिकों से रहित होना ही पंगुल बनना है । तब मन की सतोगुण, रजोगुण, तमोगुण आदिक सम्पूर्ण वासनाएँ विलय हो जाती हैं । ऐसे मुक्त - पुरुषों के शरीर की युवा अवस्था भी हो तो क्या ? जैसे - दत्तात्रय, शुकदेव, अंबरीष, ध्रुव, प्रह्लाद, जनक, सनकादिक, दादूदयाल, सुन्दरदास, रज्जब इत्यादि महापुरुषों के आख्यान सभी जानते हैं । इन सबका मन माया - वासना से रहित होना ही बूढ़ा हो जाना है ॥५६॥
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*दादू कच्छप अपने कर लिये, मन इन्द्री निज ठौर ।*
*नाम निरंजन लाग रहु, प्राणी परिहर और ॥५७॥*
टीका - हे जिज्ञासुओं ! जैसे कछुवा बाहर के भय से अपने अंगों को भीतर खैंच लेता है, इसी प्रकार साधक पुरुष अपने पांचों ज्ञान इन्द्रियों और मन को अन्तर्मुख करके निरंजन शुद्धब्रह्म के चिंतन में लगा रहता है । बाकी सम्पूर्ण बहिरंग साधनों का त्याग कर देता है ॥५७॥
यथा संहरते चायं कूर्मोऽन्गानीव सर्वत: ।
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥(गीता)
(जब साधक कछुए की तरह अपनी इन्द्रियों को विषयों से हटा लेता है, तब उसकी बुद्घि ब्रह्म में स्थित हो जाती है ।)
(क्रमशः)

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