*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"*
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज
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*= मन का अंग १० =*
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*हीरा मन पर राखिये, तब दूजा चढै न रंग ।*
*दादू यों मन थिर भया, अविनाशी के संग ॥५२॥*
टीका - हे जिज्ञासुओं ! निर्गुण राम का नाम - स्मरण रूप हीरा इस मन पर राखिये, फिर माया का रंग(सांसारिक विषय) इस पर प्रभावी नहीं होगा । इस प्रकार फिर अविनाशी के रंग में रंगा हुआ मन परब्रह्म के साथ स्थिर हो जाता है ॥५२॥
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*सुख दुख सब झांई पड़ै, तब लग काचा मन ।*
*दादू कुछ व्यापै नहीं, तब मन भया रतन ॥५३॥*
टीका - हे जिज्ञासुओं ! जब इस मन को सुख और दुःख व्याप्त होता है, यही इस पर झांई पड़ना है, अर्थात् जब तक परिस्थितियों की अनुकूलता और प्रतिकूलता से मन सुख - दुःख का अनुभव करता है, तब तक यह मन साधन अवस्था में भी कच्चा है । जब मन में सुख - दुःख, राग - द्वेष आदि का संकल्प मात्र भी नहीं रहे, तब यह मन ‘रतन’ अर्थात् ब्रह्म - स्वरूप हो जाता है ॥५३॥
"सुखस्य दु:खस्य न कोऽपि दाता ।"
"कोउ न काहू सुख दुख कर दाता ॥"
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*दादू पाका मन डोलै नहीं, निश्चल रहै समाइ ।*
*काचा मन दह दिशि फिरै, चंचल चहुँ दिशि जाइ ॥५४॥*
टीका - हे जिज्ञासुओं ! गुरु उपदेश के द्वारा ज्ञान - ध्यान की धारणा करके जो मन परिपक्व हो गया है, वह तो सांसारिक विषय भोगों में प्रवृत्त नहीं होता है और अखण्ड वृत्ति से ब्रह्म - चिंतन में ही लीन रहता है । किन्तु जिनका मन संसार की विषय - वासनाओं में ही व्याप्त है, सो तो दशों दिशा, कहिए दश इन्द्रियों और चतुष्टय अन्तःकरण, इन्हीं में भ्रमता है ॥५४॥
(क्रमशः)

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