॥दादूराम सत्यराम॥
*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"*
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज
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*= मन का अंग १० =*
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*दादू मार्यां बिन मानै नहीं, यहु मन हरि की आन ।*
*ज्ञान खडग गुरुदेव का, ता संग सदा सुजान ॥७९॥*
टीका - हे जिज्ञासुओं ! इस मन को विषय - वासनाओं से रहित करो, क्योंकि इसने गर्भवास में जो ईश्वर से कौल किया था, उसको भूल रहा है । हे सुजान ! गुरुदेव का जो तत्त्वज्ञान रूप खडग है, उससे इसको मार । इसकी भावनाओं का क्षय कर ताकि आजीवन पर्यन्त यह साधना करता रहे ॥७९॥
आया नर संसार में, कर साहिब से कौल ।
पवन लगत ही बिसर्या, हरि बोलो हरि बोल ।
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*मन*
*मन मृगा मारै सदा, ताका मीठा मांस ।*
*दादू खाइबे को हिल्या, तातैं आन उदास ॥८०॥*
टीका - हे जिज्ञासुओं ! इस मनरूपी मृग को मार कर, कहिए निर्वासनिक करके इसकी एकाग्रता रूपी मांस को खाओ । एकाग्रता में जो आनन्द आता है, उस मांस को जब तुम खाने लगोगे, तो फिर दूसरे जीवों के शरीररूपी मांस से तुम उदास हो जाओगे । इस साखी से परमगुरु ने किसी मांसाहारी को उपदेश किया है । वह इस उपदेश को सुनकर नतमस्तक हो गया और जीव - हिंसा का त्याग कर दिया ॥८०॥
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*कह्या हमारा मान मन, पापी परिहर काम ।*
*विषयों का संग छाड़ दे, दादू कह रे राम ॥८१॥*
टीका - हे हमारे मन ! अब तू हमारे इस कहने को मान ले । हे पापी ! कामवृत्ति को त्याग दे(काम कहने से काम के साथ क्रोध, लोभ और मोह का भी ग्रहण है ।) और "विषयों" नाम स्त्री में, स्त्री - भावना से मुक्त होकर, राम का स्मरण कर । जिससे तेरा कल्याण हो ॥७१॥
काम काल गरजै सदा, काया नगरी मांहि ।
रज्जब हारे देवता, सुर नर छूटे नांहि ॥
(क्रमशः)

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