*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"*
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज
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*= मन का अंग १० =*
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*यहु मन बहु बकबाद सौं, बाय भूत ह्वै जाइ ।*
*दादू बहुत न बोलिये, सहजैं रहै समाइ ॥७६॥*
टीका - हे जिज्ञासुओं ! यह मन ज्यादा वाचालता से, जैसे - शून्यपात का रोगी वात - प्रकोप दोष से संज्ञाविहीन हो जाता है अर्थात् कुछ का कुछ बोलने लगता है, वैसे ही बहुत ज्यादा बहिरंग वार्ता नहीं बोलना । तो यह मन फिर स्वभाव से ही राम नाम के स्मरण में समाया होगा ॥७६॥
हास मनोरथ वचन करि, मन की जीवन तीन ।
जो इनको निग्रह करे, सोई सन्त प्रवीन ॥
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*स्मरण नाम चितावणी*
*भूला भौंदू फेर मन, मूरख मुग्ध गँवार ।*
*सुमिर सनेही आपणा, आतम का आधार ॥७७॥*
टीका - आत्म - बोध के लिये, सतगुरु जिज्ञासु को नाना उपदेश उत्तेजक सम्बोधनों से सम्बोधित करते हैं, हे भूला ! हे भौंदू ! हे मूर्ख ! हे माया आसक्त ! हे गँवार ! हे विषियों के यार ! इस मन को बाह्य विषयों से उलट करके अपने परम स्नेही परमेश्वर का अन्तःकरण में स्मरण करिये । क्योंकि आत्म-कल्याण का यही एक मुख्य साधन है ॥७७॥
मूर्खस्य पंच चिेानि, गर्वी दुर्वचनस्तथा ।
आलसी, प्रमादी च हठी चैव दुराग्रही ॥
छन्द -
कहूँ भूल्यो काम रत्त, कहूँ भूल्यो साधि जत्त,
कहूँ भूल्यो गृह मध्य, कहूँ वनवासी है ।
कहूँ भूल्यो नीच जान, कहूँ भूल्यो ऊंच मान,
कहूँ भूल्यो मोह बँध, कहूँ तो उदासी है ॥
कहूँ भूल्यो मौन धरि, कहूँ बकवाद करि,
कहूँ भूल्यो मक्का जाय, कहूँ भूल्यो कासी है ।
सुन्दर कहत, अहंकार ही तैं भूल्यो आप,
एक आवै रोज और दूजे आवै हाँसी है ॥
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*मन माणिक मूरख राखि रे, जण जण हाथ न देहु ।*
*दादू पारिख जौंहरी, राम साधु दोइ लेहु ॥७८॥*
टीका - हे जिज्ञासु ! इस मायिक रूप मन की विषय - वासनाओं से रक्षा कर । हे मूर्ख ! वासनारूप हाथों में इस मनरूपी माणिक को मत दे । राम और साधु, दो ही इस माणिक की परीक्षा करने वाले हैं अथवा तत्त्ववेत्ता संत कहते हैं कि इस मनरूपी माणिक को राम के अर्पण करके राम को ले ले । ऐसी ही इस मन की कीमत है ॥७८॥
(क्रमशः)

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