॥दादूराम सत्यराम॥
*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"*
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज
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*= मन का अंग १० =*
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*इंद्री अपने वश करै, सो काहे जाचन जाइ ।*
*दादू सुस्थिर आत्मा, आसन बैसै आइ ॥६१॥*
टीका - हे जिज्ञासुओं ! गुरु उपदेश का विचार करके यह मन इन्द्रियों को अपने काबू में कर लेता है, फिर यह क्यों विषय - वासनाओं की याचना करने जाय ? अर्थात् नहीं जाता है और अन्तःकरण में स्थिर होकर आत्म - स्वरूप हो जाता है ॥६१॥
वली पास गयो बादशाह, लीने हाथ समेट ।
अरु जयसिंह द्विज सैन दे, जल पत्थर शुचि पेट ॥
दृष्टान्त - एक बादशाह के वली नाम का वजीर था । वह बड़ा सच्चा और न्यायकारी था । बादशाह के पास विचार - विमर्श के लिये आया । बादशाह का उस समय मूड ठीक नहीं था । वह कुछ बोला नहीं । वह बहुत देर तक बादशाह के आगे हाथ जोड़े खड़ा रहा । उसी दौरान वजीर के पाजामें में एक चींटा घुसकर काटने लगा । बादशाह के सामने हाथ जोड़े हुये होने के कारण वह उसे निकाल भी नहीं सकता था । कुछ समय बाद बादशाह से परामर्श करने पर एकान्त में जाकर चिंटे हुए चींटे को निकाला । वली ने मन में विचार किया कि इससे मैं ज्यादा पढ़ा लिखा और न्याय में निपुण हूँ । अब मेरे अन्दर ऐसी कौन सी कमी है, जिसने मुझे इसका गुलाम बना रखा है । तब उसको भान हुआ कि इन इन्द्रियों की भोग ने मुझे इसका गुलाम बना रखा है । इस वासना का त्याग करके, मैं अपना कल्याण करूँगा । तत्काल ही जंगल में जाकर निर्जन स्थान में बैठ गया । बादशाह मंत्रियों को साथ लेकर वली को ढूंढ़ते - ढूंढ़ते वहाँ जा पहुँचे । वली ने दूर से देखा कि बादशाह आ रहा है । ‘पहले तो मैं इसके पास जाता था, आज निर्वासनिक होते ही यह मेरे पास आया है ।’ उस समय वली सिद्ध आसन से बैठे हुए थे, दोनों हाथ सीधे थे । अपने हाथों को उठाकर अपनी काखों में दबा लिया और दोनों पाँव बादशाह की तरफ फैला दिए । बादशाह ने पूछा - वली हमें पाँव कब से बतलाए ? वली - जब से हाथ समेट लिए, तब से तुम्हें पाँव बतलाए । बादशाह वली के सामने नत - मस्तक हो गया और कहने लगा, अब आप वली नहीं रहे, बली बन गये हो । यह कहकर बादशाह वापिस चल दिया ।
द्वितीय दृष्टान्त - आमेर के राजा जयसिंह थे । उनके पास एक रोज एक ब्राह्मण याचना करने आया । उस समय राजा संध्या कर रहा था । ब्राह्मण को नमस्कार नहीं किया । ब्राह्मण ने एक पत्थर की कंकरी लेकर राजा के जल के पात्र में डाल दी और राजा को कहा कि इसे जल में तिरा दे । तू बड़ा रामचन्द्र ही आ गया, जो समुद्र पर पुल बांध देगा । जयसिंह समझ गये । राजा ने जल से तीन आचमन लेकर मुँह में डाल ली और ब्राह्मण को चुनौती देते हुए कहा - तू बड़ा अगस्त्य आ गया है, जो सारे समुद्र को जल की तरह पी जाएगा । रामचन्द्र और अगस्त्य दोनों इन्द्रिजीत थे । तभी वे पुल बाँधने और समुद्रजल पीने में समर्थ हो सके थे । राजा ब्राह्मण से यथा - योग्य मिले और जिस इच्छा से ब्राह्मण आया था, उसकी इच्छा पूरी की ।
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*मन मनसा दोनों मिले, तब जीव किया भांड ।*
*पंचों का फेर्या फिरै, माया नचावै रांड ॥६२॥*
टीका - हे जिज्ञासुओं ! मन की विषय - वासना ने जीव को अति दीन बना दिया है । जिस प्रकार भांड, परपुरुषों की स्तुति से निर्वाह करता है, उसी प्रकार यह अज्ञानी जीव, पंच ज्ञान इन्द्रियों की पूर्ति के लिए, मायिक पदार्थों की कामना करता है और इस प्रकार माया रूपी रांड का नचाया नाचता है, अर्थात् विषय - वासना में ही रत्त रहता हैं ॥६२॥
सुन्दर तृष्णा भांडनी, लोभ बड़ो अति भांड ।
जैसो ही रंडवो मिल्यौ, तैसी मिल गई रांड ॥
मन इच्छा सब किये से, लाज लगत है अन्त ।
इब्राहीम लज्जित हुए, कहा उन्हें जब संत ॥
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*दादू नकटी आगे नकटा नाचे, नकटी ताल बजावे ।*
*नकटी आगे नकटा गावे, नकटी नकटा भावे ॥६३॥*
टीका - हे जिज्ञासुओं ! विषय - वासनाओं में रत्त हुई मनसा नकटी और नकटा मायावी मन, विविध प्रकार के विषय - वासनाओं के मनोरथ हैं, वही मन का नृत्य करना है और मन की नाना विषय - तृष्णा आदि में आसक्ति ही मानो मनसा रूपी नकटी का ताल बजाना है । विषयों की जो सराहना करना है, वही मन का गायन करना है । इस प्रकार नकटी मनसा को ऐसा नकटा मन ही प्रिय लगता है ॥६३॥
(क्रमशः)

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