*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"*
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज
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*= मन का अंग १० =*
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*आन लगन व्यभिचार*
*पांचों इंद्री भूत हैं, मनवा क्षेत्रपाल ।*
*मनसा देवी पूजिये, दादू तीनों काल ॥६४॥*
टीका - हे जिज्ञासुओं ! प्रातःकाल, मध्योकाल, सायंकाल अर्थात् बाल्यावस्था, यौवनावस्था, वृद्धावस्था, ये सब तीन काल हैं । सारा संसार इन्द्रिय आदि को भूत - प्रेत, मन को भैरव - क्षेत्रपाल, मनसा को देवी की तरह पूजते हैं । मनसा और इन्द्रियों के वशीभूत होकर ये प्राणी परमेश्वर को भूलकर तीनों कालों में क्षेत्रपाल, देवी, भूत आदि की पूजा करते हैं ॥६४॥
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*जीवत लूटै जगत सब, मृतक लूटैं देव ।*
*दादू कहाँ पुकारिये, कर कर मूये सेव ॥६५॥*
टीका - हे जिज्ञासुओं ! जीवित अवस्था में तो इस प्राणधारी को इसके कुटुम्बी लोग मोह में अन्धा करके लूटते हैं, आवश्यक पदार्थ मांगते रहते हैं और फिर वही कुटुम्बी मरने के बाद, पित्र बनके लूटते हैं, सेवा कराते हैं, मांगते हैं । सतगुरु महाराज कहते हैं कि इन राम से बेमुख सांसारिक जीवों की सेवा कर - करके उनके साथ मरे जाते हैं । अब इस मन को कहाँ तक समझावें ? देव, शिव आदिक भी इसको समझा - समझा के थक गए हैं, किन्तु यह स्व स्वरूप को नहीं पहचानता है ॥६५॥
छन्द -
बैरी घर मांही तेरे, जानत सनेही मेरे,
दारा, सुत वित्त तेरो, खोसि खोसि खांहिंगे ।
औरहु कुटुम्बी लोग लूटैं चहुँ ओर हि तैं,
मीठी मीठी बात कहि, तोसौं लपटाहिंगे ।
संकट परेगो जब कोई नहिं तेरो तब,
अतिही कठिन बांकी बेर उठि धाहिंगे ।
सुन्दर कहत ताते झूठो ही प्रपंच सब,
स्वपने की नाईं, सब देखत बिलाहिंगे ॥
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*मन*
*अग्नि धूम ज्यों नीकलै, देखत सबै बिलाइ ।*
*त्यों मन बिछुटा राम सौं, दह दिश बीखर जाइ ॥६६॥*
टीका - हे जिज्ञासुओं ! जैसे अग्नि से धुआँ निकल कर देखते - देखते ही आकाश में फ़ैल कर नष्ट हो जाता है, वैसे ही यह व्यष्टि मन, समष्टि चैतन्य से अलग होकर दसों इन्द्रियों के विषयों में व्याप्त हो जाता है । ब्रह्म से विमुख हुआ मन, धुएँ की भाँति फिर अन्तर्मुख नहीं होता है । इसलिये उत्तम साधक, मन को प्रयत्न द्वारा विषयों से विरक्त ही रखते हैं ॥६६॥
छन्द -
देखे न कुठौर ठौर, कहै और हि की और,
लीन जाइ होत हाड़ मांस हू रकत में ।
करत बुराई सब, औसर न जाने कछु,
धक्का आइ देत राम नाम सूं लगत में ॥
बाहे सुर असुर, बहाये सब भेष जन,
सुन्दर कहत दिन घालत भगत में ।
और हू अनेक अंतराय ही करत रहै,
मन सो न कोऊ है अधम या जगत में ॥
(क्रमशः)

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